उत्तर प्रदेश कांग्रेस में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ है। नवनियुक्त प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के कार्यभार संभालते ही पार्टी मजबूत हुई है। फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद के करीबी पूर्व प्रत्याशी हसीब खान कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। उनके साथ भावी प्रत्याशी राजेश शुक्ला और सैकड़ों समर्थकों ने भी सदस्यता ली है।
सूत्रों के अनुसार, हसीब खान के संपर्क वाले कई OBC और SC समाज के छोटे दल जल्द ही कांग्रेस को समर्थन दें सकते हैं।
आज की कहानी भी ऐसे ही एक युवा चेहरे की है .... जिसने न किसी राजनीतिक परिवार का सहारा लिया, न विरासत में कोई सत्ता मिली। सिर्फ लोगों का भरोसा.... अपनी मेहनत... और समाज के बीच लगातार मौजूद रहने की जिद के दम पर उसने कुछ ही वर्षों में पूर्वांचल की राजनीति में अपनी पहचान दर्ज करा दी। कौन है हसीब खान...
एक ऐसा सफर... जो 2021 में शुरू हुआ... लेकिन कुछ ही वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया। आखिर कौन हैं हसीब खान? कैसे एक छोटे राजनीतिक मंच से शुरू हुआ उनका सफर ? किस तरह उन्होंने संगठन को मजबूती दी? और क्यों आज उनका नाम पूर्वांचल की राजनीति में लगातार सुनाई देता है? आइए. शुरुआत से जानते हैं हसीब खान की पूरी राजनीतिक यात्रा... संघर्ष से पहचान तक की कहानी। साल 2021 में राजनीति में सक्रिय हुए हसीब खान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जनवादी सोशलिस्ट पार्टी से की। उस समय पार्टी का दायरा सीमित था, लेकिन संगठन विस्तार और लगातार जनसंपर्क के दम पर उन्होंने पूर्वांचल में पार्टी को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के गठबंधन में बलिया की रसड़ा, कुशीनगर की खड्डा और बलरामपुर की उतरौला विधानसभा सीट पार्टी को मिली।
इन तीनों सीटों को दिलाने में हसीब खान की अहम भूमिका बताई जाती है। राजनीतिक जानकार इसे उनकी बड़ी उपलब्धियों में से एक मानते हैं, और उनकी मेहनत तथा संगठन क्षमता की सराहना करते हैं। उतरौला विधानसभा से गठबंधन प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए हसीब खान ने लगभग 65 हजार वोट हासिल किए। भले ही उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन उन्होंने मजबूत जनाधार तैयार किया और चुनाव के बाद भी क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहकर अपनी अलग पहचान बनाई। स्थानीय राजनीति में उन्हें एक जमीनी नेता के रूप में देखा जाता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की ओर से उतरौला विधानसभा सीट पर लगभग 65 हजार वोट हासिल करने वाले हसीब खान पहले प्रत्याशी माने जाते हैं। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है, कि यदि पीडीए (PDA) गठबंधन बना रहता है, तो हसीब खान की स्थिति काफी मजबूत हो सकती है।
इसका आधार यह बताया जाता है कि 2022 के चुनाव में हसीब खान को 65 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी धीरेंद्र प्रताप सिंह को लगभग 12,944 वोट प्राप्त हुए थे। तो अगर 65 + 13 कर देते हैं तो 78 हज़ार वोट हो जायेंगे जोकि हार जीत के अंतर को काफी कम कर देते हैं, ऐसे में ये साफ़ कहा जा सकता है की 2027 में हसीब खान की जीत तय हैं, इसी आधार पर राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है, कि यदि दोनों दलों का गठबंधन होता है, तो उतरौला सीट पर मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है। हसीब खान की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। सामाजिक और इस्लामिक क्षेत्र में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। किछौछा शरीफ के सज्जादानशीन मोईन मियां (मोईन- ए-मिल्लत), हाशमी मियां, नूरानी मियां, बिलग्राम शरीफ के सिबली मियां, सैय्यद रिजवान मियां, सुहैल मियां, अजमेर शरीफ के खादिमों तथा उतरौला के मौलाना मसीहुद्दीन साहब सहित कई प्रतिष्ठित मुस्लिम धर्मगुरुओं से उनके करीबी संबंध बताए जाते हैं। यही कारण है कि प्रदेश के कई छोटे राजनीतिक और सामाजिक संगठन भी उनके संपर्क में हैं। इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा तेज है कि कांग्रेस नए चेहरों को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने की तैयारी कर रही है।
इसी कड़ी में हसीब खान का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि भविष्य में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन होता है और उतरौला विधानसभा सीट कांग्रेस के हिस्से में आती है, तो हसीब खान सबसे मजबूत दावेदारों में से एक हो सकते हैं। इसके पीछे 2022 में मिले लगभग 65 हजार वोट और चुनाव हारने के बाद भी क्षेत्र में लगातार उनकी सक्रियता को प्रमुख कारण माना जाता है। महज कुछ वर्षों में हसीब खान ने यह साबित किया है कि मेहनत, संगठन और जनता के बीच लगातार मौजूदगी किसी भी नेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। अब सभी की नजर इस बात पर हैं कि कांग्रेस उन्हें भविष्य में क्या जिम्मेदारी देती है। इतना तय है कि हसीब खान का नाम अब केवल उतरौला तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से उभरते युवा नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है।
कम समय में उन्होंने जो राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक पहचान बनाई है, उसने उन्हें प्रदेश के उभरते नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक यात्रा किस नई दिशा में आगे बढ़ती है।संघर्ष उनकी पहचान है, जनसमर्थन उनकी ताकत है और जनता के बीच लगातार मौजूद रहना उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन चुका है। आज हसीब खान केवल एक नेता नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की नई राजनीतिक पीढ़ी के उन चेहरों में शामिल हैं, जिन पर आने वाले समय की राजनीति की नजर टिकी हुई है।
'श्री हसीब खान ने कहा "
"देश की शिक्षा व्यवस्था आईसीयू (ICU) में है। मोदी सरकार के कार्यकाल में 80 से ज्यादा पेपर लीक की घटनाओं ने करोड़ों छात्रों का भविष्य बर्बाद कर दिया है। पेपर लीक के कारण कई छात्र आत्महत्या करने को मजबूर हुए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीड़ित परिवारों को सांत्वना तक नहीं दी। आज नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पूरी तरह कॉम्प्रोमाइज हो चुकी है, जिससे देश का पूरा एजुकेशनल स्ट्रक्चर ही ढह गया है। यह सिर्फ पेपर लीक नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य का लीक है।"