बख्शी का तालाब इंटर कॉलेज में बच्चे नवाचार में रुचि नहीं लेते थे। किताब थी अध्यापक भी थे लेकिन बच्चे ऊब जाते थे। कक्षा में शांति तो रहती थी पर सीखने का उत्साह कम था।
नए सत्र में विज्ञान अध्यापक हरिश्चन्द्र सिंह ने सोचा कुछ अलग करना होगा! छोटे-छोटे नवाचार शुरू किए - शब्दों के चित्रकार्ड, विज्ञान के लिए कबाड़ के मॉडल बनवाए। कक्षा में "खेल-खेल में सीखो" का कोना बनाया। धीरे-धीरे बच्चों की आँखों में चमक आ गई। अब वे सवाल पूछते, खुद जवाब ढूंढते, मिलकर काम करते। अनुपस्थित रहने वाले बच्चे भी रोज विद्यालय आने लगे। आसपास के लोग एवं अभिभावक भी कहने लगे "अब तो हमारा विद्यालय बदल गया है" परीक्षा में परिणाम बेहतर आया, लेकिन बड़ी खुशी यह थी कि बच्चे अब सीखने में आनंद लेने लगे *सीख - नवाचार बड़ा खर्च नहीं बड़ा सोच है। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।*
*हरिश्चन्द्र सिंह*