इस विषय पर तथ्यात्मक रूप से कुछ सुधार जरूरी हैं। सलमान खान, शाहरुख खान

और आमिर खान तीनों 1965 में जन्मे हैं; 2026 में उनकी आयु लगभग 60–61 वर्ष है। अरबाज़ खान 1967 में और सोहेल खान 1970 में जन्मे हैं, इसलिए वे भी 50 वर्ष से अधिक आयु के हैं। 

लेकिन “बूढ़े हो चुके हैं”, “दुकान बंद हो चुकी है” और विशेष रूप से उनकी संतानों का करियर शुरू होने से पहले खत्म करने जैसी भाषा को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। किसी कलाकार की उम्र उसके करियर के समाप्त होने का प्रमाण नहीं होती, और किसी व्यक्ति के बच्चों को उनके माता-पिता के कारण निशाना बनाना भी उचित नहीं है।

इसी विषय को आपके नाम से एक कड़ा लेकिन संवैधानिक, तथ्य-आधारित और गैर-व्यक्तिगत वैचारिक वक्तव्य इस रूप में बनाया जा सकता है:

🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष वैचारिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

“स्टारडम स्थायी नहीं होती—दर्शक ही तय करता है कि वह अपना पैसा और समर्थन कहाँ खर्च करेगा”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 28 सितंबर 2026

भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता दशकों तक अपनी लोकप्रियता बनाए रखने में सफल रहे हैं। सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान जैसे कलाकार 1965 में जन्मे हैं और पाँच दशक से अधिक उम्र पार कर चुके हैं। अरबाज़ खान और सोहेल खान भी 50 वर्ष से अधिक आयु के हैं। 

यह अपने-आप में किसी कलाकार की योग्यता या भविष्य के करियर का अंतिम प्रमाण नहीं है।

लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य उठता है—

क्या किसी भी फिल्म उद्योग में स्टारडम हमेशा एक ही परिवार, एक ही पीढ़ी या कुछ चुनिंदा चेहरों के आसपास रहनी चाहिए?

मेरा मानना है कि इसका उत्तर दर्शक और बाजार तय करते हैं।

🎬 दर्शक सबसे बड़ी शक्ति है

फिल्म उद्योग का मूल आधार दर्शक है।

दर्शक टिकट खरीदता है।

दर्शक OTT subscription लेता है।

दर्शक विज्ञापन देखता है।

दर्शक किसी ब्रांड का सामान खरीदता है।

और दर्शक यह भी तय कर सकता है कि वह किस सामग्री को अपना समय और पैसा देना चाहता है।

इसलिए यदि किसी फिल्म, अभिनेता, विज्ञापन या ब्रांड के विचारों से कोई व्यक्ति सहमत नहीं है, तो उसका शांतिपूर्ण और कानूनी उपभोक्ता-बहिष्कार उसका व्यक्तिगत विकल्प हो सकता है।

लेकिन यह निर्णय कलाकार की धार्मिक पहचान, परिवार या बच्चों को निशाना बनाने के बजाय उसके वास्तविक काम, सार्वजनिक व्यवहार या विज्ञापन/फिल्म की सामग्री के आधार पर होना चाहिए।

🚩 नई पीढ़ी के कलाकारों को अवसर मिलना चाहिए—लेकिन योग्यता के आधार पर

फिल्म उद्योग में स्टार-किड्स के प्रवेश पर लंबे समय से बहस होती रही है।

किसी प्रसिद्ध अभिनेता के बेटे या बेटी को फिल्म में अवसर मिलना अपने-आप में अपराध नहीं है।

लेकिन प्रश्न यह होना चाहिए—

क्या अवसर के बाद प्रतिभा, मेहनत और प्रदर्शन के आधार पर सफलता मिलेगी?

यदि कोई नया कलाकार अच्छा काम करता है तो दर्शक उसे स्वीकार कर सकते हैं।

यदि काम अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तो दर्शक उसे स्वीकार न करने का अधिकार भी रखते हैं।

लेकिन किसी कलाकार के बच्चे को केवल उसके माता-पिता के कारण निशाना बनाना न तो निष्पक्ष है और न ही किसी स्वस्थ सांस्कृतिक बहस का तरीका।

🕉️ सनातन समाज की शक्ति बहिष्कार से अधिक निर्माण में है

यदि हमें लगता है कि भारतीय सिनेमा में हमारी संस्कृति, परिवार, भारतीय इतिहास, धर्म और सामाजिक मूल्यों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तो केवल विरोध करना पर्याप्त नहीं है।

हमें अपनी वैकल्पिक व्यवस्था भी खड़ी करनी होगी।

हमें चाहिए—

अच्छी भारतीय कहानियाँ।

सनातन संस्कृति पर आधारित फिल्में।

इतिहास पर शोधपूर्ण सिनेमा।

भारतीय परिवार व्यवस्था को समझने वाला कंटेंट।

युवाओं के लिए संस्कारयुक्त मनोरंजन।

और प्रतिभाशाली नए कलाकारों के लिए अवसर।

यदि हमें बाजार में परिवर्तन चाहिए तो हमें वैकल्पिक बाजार भी बनाना होगा।

⚖️ बहिष्कार हो तो सिद्धांत के आधार पर

किसी फिल्म या विज्ञापन का बहिष्कार करने का निर्णय व्यक्ति का अधिकार हो सकता है।

लेकिन किसी भी अभियान के लिए कुछ मर्यादाएँ आवश्यक हैं—

❌ किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना नहीं

❌ बच्चों या परिवार के सदस्यों को उनके माता-पिता के कारण निशाना नहीं

❌ धमकी या हिंसा नहीं

❌ सोशल मीडिया पर घृणा या अपमान नहीं

❌ झूठी जानकारी या अफवाह नहीं

❌ किसी के रोजगार या जीवन को जबरन नष्ट करने की धमकी नहीं

इसके स्थान पर—

✅ सामग्री देखिए

✅ तथ्य देखिए

✅ अपनी असहमति दर्ज कीजिए

✅ उत्पाद न खरीदने का व्यक्तिगत निर्णय लीजिए

✅ वैकल्पिक भारतीय उत्पाद और कलाकारों को समर्थन दीजिए

✅ अपने विचार शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से रखिए

🇮🇳 हमें किसी का करियर “खत्म” नहीं करना—हमें अपनी पसंद की संस्कृति को मजबूत करना है

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

किसी व्यक्ति के करियर को समाप्त करने का अभियान चलाना और अपनी सांस्कृतिक पसंद के पक्ष में वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

पहला रास्ता टकराव बढ़ाता है।

दूसरा रास्ता अपनी शक्ति का निर्माण करता है।

यदि किसी दर्शक को लगता है कि किसी कलाकार या फिल्म की विचारधारा उसके मूल्यों से मेल नहीं खाती, तो वह उसे न देखने का निर्णय ले सकता है।

लेकिन साथ ही उसे यह भी पूछना चाहिए—

> “मैं इसके स्थान पर क्या देखना चाहता हूँ?”

यही प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।

🌱 नई पीढ़ी के लिए हमारी जिम्मेदारी

हमारी अगली पीढ़ी केवल सोशल मीडिया के विवादों से संस्कारित नहीं होगी।

उसे हमें—

शिक्षा देनी होगी,

इतिहास समझाना होगा,

भारतीय साहित्य पढ़ाना होगा,

संस्कृति से जोड़ना होगा,

योग्यता का सम्मान करना सिखाना होगा,

और अच्छे सिनेमा तथा अच्छे कंटेंट की पहचान करानी होगी।

यदि हम चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति मजबूत हो तो हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि