🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष संवैधानिक एवं वैचारिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

अखंड भारत नहीं तो क्या?—विभाजन के बाद भारत में अल्पसंख्यक आयोग, अल्पसंख्यक कल्याण और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका पर तथ्यात्मक सवाल”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 29 सितंबर 2026

🇮🇳 विभाजन की त्रासदी और आज का भारत

1947 का भारत-विभाजन आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक था। भारत और पाकिस्तान के निर्माण के साथ बड़े पैमाने पर जनसंख्या का विस्थापन हुआ। भारत की 1951 की जनगणना के अभिलेख के अनुसार, उस जनगणना में भारत में पाकिस्तान से आए लगभग 72 लाख विभाजन-विस्थापित व्यक्तियों को दर्ज किया गया था; पाकिस्तान में भी भारत से आए लगभग 71.5 लाख विस्थापितों का उल्लेख मिलता है। 

लेकिन एक संवैधानिक तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए—

> विभाजन पाकिस्तान के निर्माण के साथ हुआ था; स्वतंत्र भारत ने अपने यहाँ रहने वाले नागरिकों को केवल उनके धर्म के आधार पर नागरिकता से बाहर करने की व्यवस्था नहीं अपनाई।

इसी संवैधानिक व्यवस्था के कारण विभाजन के बाद भारत में रहने वाले मुस्लिम नागरिक भी भारत के नागरिक बने रहे और उन्हें संविधान के अंतर्गत अधिकार प्राप्त हुए।

❓ फिर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग क्यों बनाया गया?

National Commission for Minorities (NCM) कोई केवल मुस्लिम आयोग नहीं है।

यह National Commission for Minorities Act, 1992 के तहत बनाया गया वैधानिक आयोग है। कानून के अनुसार “minority” उस समुदाय को कहा जाता है जिसे केंद्र सरकार अधिसूचित करे। आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य होते हैं। 

केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित छह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं—

मुस्लिम

ईसाई

सिख

बौद्ध

पारसी

जैन

जैन समुदाय को 27 जनवरी 2014 को अधिसूचित सूची में जोड़ा गया था। 

इसलिए—

> NCM को केवल “मुस्लिम आयोग” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

⚖️ संविधान में अल्पसंख्यक अधिकारों का आधार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 नागरिकों को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार देता है।

इसलिए अल्पसंख्यक अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था को केवल 1947 के विभाजन की राजनीति से समझना पर्याप्त नहीं है। यह स्वतंत्र भारत के संवैधानिक ढाँचे का हिस्सा है।

🕌 “मुस्लिम राष्ट्रीय मंच” और “राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग” अलग-अलग हैं

यह अंतर भी समझना जरूरी है।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (Muslim Rashtriya Manch) एक सामाजिक संगठन है। इसे भारत सरकार के वैधानिक आयोग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग संसद द्वारा बनाए गए NCM Act, 1992 के तहत गठित वैधानिक संस्था है। 

अर्थात दोनों की कानूनी प्रकृति और भूमिका अलग है।

🚩 लेकिन प्रतिनिधित्व का सवाल भी जायज़ है

यदि NCM छह अलग-अलग अधिसूचित धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित है, तो उसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों के चयन में प्रतिनिधित्व तथा नियुक्ति के मानदंड पर सार्वजनिक चर्चा होना स्वाभाविक है।

लेकिन इस चर्चा में तथ्य भी सामने रखने होंगे।

यह कहना सही नहीं होगा कि स्वतंत्रता के बाद से NCM का अध्यक्ष हर बार मुस्लिम ही रहा है।

आधिकारिक NCM रिकॉर्ड के अनुसार—

1993–96 — न्यायमूर्ति मोहम्मद सरदार अली खान

1996–99 — प्रो. डॉ. ताहिर महमूद

2000–03 — न्यायमूर्ति मोहम्मद शमीम

2003–06 — सरदार तरलोचन सिंह

2006–10 — मोहम्मद हामिद अंसारी और मोहम्मद शफी कुरैशी

2011–14 — वजाहत हबीबुल्लाह

2014–17 — नसीम अहमद

2017–20 — सैयद गयोरुल हसन रिजवी

2021–25 — इकबाल सिंह लालपुरा

21 जुलाई 2026 से वर्तमान आयोग के अध्यक्ष — हरजीत सिंह ग्रेवाल 

इसलिए बहस का अधिक तथ्यात्मक प्रश्न यह है—

> “छह अधिसूचित धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों वाले आयोग में नियुक्तियों के लिए सरकार किन योग्यता, अनुभव और प्रतिनिधित्व संबंधी मानदंडों को अपनाती है और क्या वे मानदंड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने चाहिए?”

यह सवाल किसी व्यक्ति के धर्म के बजाय संस्थागत पारदर्शिता पर केंद्रित है।

⚖️ “अल्पसंख्यक मंत्री” का पद किसी धर्म के लिए आरक्षित नहीं

यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का मंत्री पद किसी धार्मिक समुदाय के लिए संवैधानिक रूप से आरक्षित नहीं है।

वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार किरेन रिजिजू केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री तथा जॉर्ज कुरियन राज्य मंत्री हैं। 

मंत्रालय का दायरा छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित नीतियों, योजनाओं और विकास कार्यक्रमों तक है। 

इसलिए प्रश्न यह होना चाहिए—

> क्या मंत्रालय की योजनाओं का लाभ निर्धारित पात्रता और उद्देश्य के अनुसार सभी पात्र समुदायों तक पहुँच रहा है?

इसका उत्तर भावनात्मक दावों से नहीं बल्कि बजट, लाभार्थी आँकड़ों, राज्यवार वितरण और योजना के परिणामों से निकाला जाना चाहिए।

💰 “मुस्लिम लाभ” बनाम “अल्पसंख्यक कल्याण”

किसी भी सरकारी योजना को केवल इसलिए “मुस्लिमों की योजना” कहना सही नहीं होगा कि उसमें मुस्लिम लाभार्थी बड़ी संख्या में हैं।

केंद्र का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय छह अधिसूचित समुदायों के लिए कार्य करता है। मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि उसकी कई योजनाओं में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों को लक्ष्य बनाया गया है। 

उदाहरण के लिए, मंत्रालय की छात्रवृत्ति योजनाओं में छह अधिसूचित समुदायों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी—के पात्र विद्यार्थी शामिल हैं। 

इसलिए वास्तविक सवाल यह होना चाहिए—

किस योजना में कितना पैसा गया?

किस समुदाय को कितने लाभार्थी मिले?

किस राज