• Home
  • Uttar Pradesh
  • Lucknow
  • ?????? Bharat Vimarsh (Discourse on India) ?????? The Debate on ‘Regime Change’ in India: Democracy, Constitutional Institutions, and National Interest

🇮🇳🚩 भारत विमर्श 🚩🇮🇳 भारत में ‘रिजीम चेंज’ की बहस: लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाएँ और राष्ट्रीय हित

विरोध का अधिकार लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन सत्ता परिवर्तन का मार्ग संविधान और जनादेश से ही तय होना चाहिए।

विषय: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन, प्रशांत भूषण के ‘रिजीम चेंज’ संबंधी बयान तथा राजनीतिक आंदोलनों की संवैधानिक सीमाओं पर विस्तृत वैचारिक वक्तव्य।

विचार एवं वक्तव्यकर्ता:

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

1. मेरा स्पष्ट प्रश्न: लोकतांत्रिक विरोध और सत्ता परिवर्तन की राजनीति की सीमा क्या है?

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ किसी सरकार की नीतियों का विरोध करना, चुनाव आयोग से जवाब माँगना, मतदाता सूची में अनियमितताओं की शिकायत करना और किसी संवैधानिक पदाधिकारी के निर्णयों की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है।

लेकिन इसके साथ एक बुनियादी प्रश्न भी जुड़ा हुआ है—क्या किसी राजनीतिक आंदोलन के उद्देश्य, उसकी भाषा, उसके नेतृत्व और उसके तरीकों की समीक्षा नहीं होनी चाहिए?

अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इन प्रदर्शनों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP), छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी राजनीति से जुड़े लोगों की भागीदारी की खबरें सामने आई हैं। <escape>10 अक्टूबर</escape> के आसपास दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शनों तथा बाद के घटनाक्रमों ने इस विवाद को और राजनीतिक रूप दिया। <escape>[1]</escape>

15 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक सार्वजनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आंदोलन को ‘रिजीम चेंज’ अर्थात सत्ता परिवर्तन की लड़ाई बताया। इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद तेज हुआ और सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इसे सरकार को चुनावी प्रक्रिया के बाहर हटाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया। दूसरी ओर, भूषण ने सत्ता परिवर्तन की माँग को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में बचाव किया। <escape>[2]</escape>

इसलिए मेरा प्रश्न किसी नागरिक के विरोध के अधिकार पर रोक लगाने का नहीं है। मेरा प्रश्न यह है कि राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की माँग किन तरीकों से की जा रही है और क्या आंदोलन के सभी नेता संवैधानिक प्रक्रिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट कर रहे हैं?

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना हो सकती है, सरकार बदलने की माँग भी की जा सकती है; लेकिन किसी भी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा, धमकी या असंवैधानिक बल प्रयोग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

2. ‘रिजीम चेंज’ शब्द का वास्तविक अर्थ समझना आवश्यक है

‘रिजीम चेंज’ का सामान्य अर्थ किसी देश की सत्ता, सरकार या शासन-व्यवस्था में परिवर्तन है। इसका अर्थ हर परिस्थिति में तख्तापलट नहीं होता।

यदि नागरिक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं, चुनाव में सरकार बदलने की अपील करते हैं, जनमत तैयार करते हैं या संवैधानिक तरीकों से किसी सरकार को हटाने की माँग करते हैं, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हो सकता है।

इसके विपरीत, यदि कोई समूह चुनावी प्रक्रिया को हिंसा, सशस्त्र दबाव, अवैध बल प्रयोग या किसी असंवैधानिक तरीके से निष्प्रभावी करने का प्रयास करता है, तो मामला गंभीर हो जाता है।

इसलिए किसी व्यक्ति द्वारा ‘रिजीम चेंज’ शब्द के इस्तेमाल से ही तख्तापलट की साजिश सिद्ध नहीं हो जाती। इसके लिए उसके पूरे बयान, संदर्भ, घोषित उद्देश्य, वास्तविक गतिविधियों और उपलब्ध प्रमाणों की जाँच आवश्यक है।

मेरा मानना है कि राजनीतिक विरोधियों के बयानों को न तो बिना जाँच के निर्दोष घोषित करना चाहिए और न ही संदर्भ से अलग करके उन्हें देशविरोधी षड्यंत्र का अंतिम प्रमाण मान लेना चाहिए।

राष्ट्रीय हित में आरोपों की गंभीरता जितनी अधिक हो, प्रमाणों की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक होनी चाहिए।

3. प्रशांत भूषण के बयान पर गंभीर बहस क्यों आवश्यक है?

15 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित समाचारों के अनुसार, प्रशांत भूषण ने CJP और उससे जुड़े लोगों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि युवा सत्ता परिवर्तन की लड़ाई का नेतृत्व करेंगे और आंदोलन ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई बन चुका है। उन्होंने इस माँग को लोकतांत्रिक अधिकार से भी जोड़ा। <escape>[2]</escape>

यह बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे आंदोलन की सार्वजनिक भाषा केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग तक सीमित नहीं दिखाई देती।

फिर भी, इस बयान से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आंदोलन का उद्देश्य हिंसक तख्तापलट है। सत्ता परिवर्तन की माँग और असंवैधानिक सत्ता कब्जाने के प्रयास में अंतर है।

मैं प्रशांत भूषण और आंदोलन के अन्य नेताओं से कुछ सीधे प्रश्न पूछना चाहता हूँ:

- क्या उनका उद्देश्य केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार और मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, या वर्तमान केंद्र सरकार को हटाना भी आंदोलन का घोषित राजनीतिक लक्ष्य है?

- यदि सरकार बदलना लक्ष्य है, तो क्या वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि इसका वैध रास्ता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रियाएँ हैं?

- क्या आंदोलन के सभी आयोजक शांतिपूर्ण विरोध, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और कानून के पालन की स्पष्ट प्रतिबद्धता लेते हैं?

- मतदाता सूची से कथित रूप से हटाए गए नामों के संबंध में उनके पास कौन-से सत्यापित आँकड़े, दस्तावेज और निर्वाचन क्षेत्रवार प्रमाण हैं?

इन प्रश्नों का उत्तर सार्वजनिक बहस को अधिक पारदर्शी बना सकता है।

मेरा मत है कि किसी भी राजनीतिक आंदोलन का मूल्यांकन उसके वास्तविक उद्देश्यों, प्रमाणों और तरीकों से होना चाहिए। केवल किसी शब्द के इस्तेमाल के आधा