• Home
  • Andaman and Nicobar
  • ?????? National President's Special Social, Humanitarian, and Ideological Statement ??????

🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष सामाजिक, मानवीय एवं वैचारिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

कब्रिस्तान में तब्दील हो जाएगा भारत”—ऐसे कथनों को भावनाओं के बजाय तथ्य और संवेदनशीलता के साथ समझना आवश्यक है

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 26 सितंबर 2026

सोशल मीडिया पर यह कथन देखने को मिलता है कि—

“अगर इसी रफ्तार से कब्रिस्तान में दफनाने का कार्य होता रहा तो एक दिन सारा भारत देश कब्रिस्तान में तब्दील हो जाएगा।”

इस प्रकार के कथन के पीछे यदि भूमि, जनसंख्या, शहरी नियोजन, कब्रिस्तान की उपलब्धता और सार्वजनिक संसाधनों को लेकर कोई वास्तविक चिंता है, तो उस पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। लेकिन किसी धार्मिक समुदाय की अंतिम संस्कार की परंपरा को पूरे देश के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

🔸 अंतिम संस्कार की परंपराएँ अलग-अलग हो सकती हैं

भारत विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं वाला देश है। अलग-अलग समुदायों में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की अलग-अलग विधियाँ हैं—कहीं दाह-संस्कार होता है, कहीं दफनाया जाता है और कुछ परंपराओं में अन्य विधियाँ भी हैं।

किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके धार्मिक संस्कार का सम्मान करना और साथ ही सार्वजनिक भूमि एवं स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था को सुव्यवस्थित रखना—दोनों बातें एक साथ संभव हैं।

🔸 असली प्रश्न होना चाहिए—भूमि और व्यवस्था का

यदि किसी शहर या क्षेत्र में कब्रिस्तानों की भूमि को लेकर समस्या उत्पन्न होती है, तो प्रश्न यह होना चाहिए कि—

उपलब्ध भूमि कितनी है?

भविष्य की आवश्यकता का आकलन क्या है?

नगर नियोजन में पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं?

सरकारी/सार्वजनिक भूमि के उपयोग के नियमों का पालन हो रहा है या नहीं?

अवैध अतिक्रमण या अनधिकृत निर्माण तो नहीं हो रहा?

सभी समुदायों के धार्मिक स्थलों और अंतिम संस्कार स्थलों के लिए कानून के अनुसार उचित व्यवस्था कैसे बनाई जाए?

इन प्रश्नों का उत्तर आंकड़ों, भूमि-अभिलेखों और स्थानीय प्रशासन की योजनाओं से मिलना चाहिए, न कि सोशल मीडिया के अनुमान से।

🔸 किसी पूरे समुदाय को निशाना बनाना समाधान नहीं

भारत में किसी भी धार्मिक समुदाय के करोड़ों नागरिक इस देश के नागरिक हैं। किसी समुदाय के अंतिम संस्कार की परंपरा के आधार पर उसके सभी सदस्यों के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकालना सामाजिक दूरी बढ़ा सकता है।

हम किसी धार्मिक परंपरा से असहमत हो सकते हैं, उसके सार्वजनिक संसाधनों से जुड़े पहलुओं पर प्रश्न उठा सकते हैं और प्रशासन से पारदर्शिता की मांग कर सकते हैं—लेकिन व्यक्ति और समुदाय की गरिमा बनाए रखते हुए।

🚩 राष्ट्रहित में संतुलित दृष्टिकोण

हमारा विषय होना चाहिए—

“धार्मिक स्वतंत्रता भी रहे, सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा भी हो;

परंपराओं का सम्मान भी हो, कानून का पालन भी हो;

प्रशासन की जिम्मेदारी भी तय हो और नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।”

यदि कहीं कब्रिस्तान के नाम पर सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा है, तो प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।

यदि कहीं भूमि की कमी है, तो भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार नियोजन होना चाहिए।

और यदि कहीं किसी समुदाय को अपने धार्मिक संस्कार के लिए वैध भूमि की आवश्यकता है, तो उसके लिए भी कानून के अनुरूप व्यवस्था होनी चाहिए।

🇮🇳 भारत किसी एक समुदाय का नहीं—सभी नागरिकों का देश है

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। हमारी असहमति चाहे जितनी भी हो, हमें ऐसी भाषा से बचना चाहिए जिससे किसी पूरे समुदाय को देश के लिए खतरा समझा जाए।

राष्ट्र की भूमि की रक्षा, कानून का पालन, पर्यावरण और नगर नियोजन—ये वास्तविक सार्वजनिक मुद्दे हैं। इन्हें धार्मिक वैमनस्य का विषय बनाने के बजाय प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से उठाया जाना चाहिए।

🇮🇳 अंतिम संदेश

कब्रिस्तान की व्यवस्था पर प्रश्न उठाना अलग बात है और किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना अलग।

जहाँ अवैध कब्जा है—कानून लागू हो।

जहाँ भूमि-प्रबंधन की समस्या है—योजना बने।

जहाँ भविष्य की आवश्यकता है—पहले से व्यवस्था हो।

और जहाँ धार्मिक अधिकार हैं—उनका भी कानून के अनुसार सम्मान हो।

हमारा राष्ट्र मजबूत तभी होगा जब हम भावनाओं के साथ विवेक,

अधिकारों के साथ कर्तव्य और धार्मिक आस्था के साथ संवैधानिक मर्यादा को भी महत्व देंगे।

🚩 “राष्ट्रहित में प्रश्न पूछिए, लेकिन समाज को बाँटने वाली भाषा के बजाय तथ्य, कानून और समाधान की भाषा अपनाइए।”

— हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 26 सितंबर 2026