🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष वैचारिक एवं धार्मिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

“पितृपक्ष: अपनी परंपरा, अपने संस्कार और अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा को समझने का समय”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 25 सितंबर 2026

पितृपक्ष आने वाला है। वर्ष 2026 में पितृपक्ष का मुख्य क्रम 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी। 

ऐसे समय में मेरा स्पष्ट विचार है कि हमें अपने पूर्वजों, अपनी परंपराओं और अपने धार्मिक संस्कारों को केवल बहस का विषय नहीं, बल्कि श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक स्मृति के रूप में समझना चाहिए।

जिन्हें ब्राह्मणों से आपत्ति है, वे पहले यह समझें कि श्राद्ध का मूल उद्देश्य क्या है

श्राद्ध का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को बुलाकर कर्मकांड करवाना नहीं है। हिन्दू परंपरा में श्राद्ध को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता से जोड़ा गया है। विभिन्न परंपराओं में तर्पण, पिंडदान, भोजन, दान और प्रार्थना जैसी विधियाँ प्रचलित हैं। 

इसलिए प्रश्न किसी व्यक्ति या जाति से नफरत करने का नहीं है; प्रश्न यह है कि हम अपने माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों के लिए जिस संस्कार को अपनी धार्मिक परंपरा मानते हैं, उसे समझकर निभाना चाहते हैं या नहीं।

यदि किसी व्यक्ति को किसी पुरोहित की पद्धति, व्यवहार या शुल्क से शिकायत है, तो वह उस व्यक्ति या व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है। लेकिन किसी एक व्यक्ति के व्यवहार के कारण पूरी धार्मिक परंपरा और उससे जुड़े सभी लोगों को गलत ठहराना उचित नहीं होगा।

श्राद्ध किसे करना चाहिए?

हिन्दू परंपराओं में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को लेकर अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में व्यवस्थाएँ मिलती हैं। सामान्यतः पुत्र को प्रमुख कर्ता माना गया है, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार अन्य निकट संबंधियों द्वारा श्राद्ध किए जाने के उल्लेख भी मिलते हैं। कुछ परंपराएँ पुत्री, पत्नी, पौत्र अथवा अन्य संबंधियों की भूमिका को भी स्वीकार करती हैं। 

अर्थात यह कहना भी सही नहीं है कि “अगर बेटा नहीं है तो श्राद्ध हो ही नहीं सकता।” उपलब्ध धार्मिक परंपराओं में इसके कई विकल्प मिलते हैं। 

क्या श्राद्ध केवल बड़े खर्च से ही होता है?

नहीं।

श्रद्धा का मूल्य भोजन की मात्रा, पंडाल की भव्यता या खर्च किए गए धन से निर्धारित नहीं होना चाहिए। यदि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है, तो उस परिवार पर दिखावे या खर्च का सामाजिक दबाव डालना उचित नहीं है।

श्राद्ध का मूल भाव स्मरण, श्रद्धा, तर्पण, दान, सेवा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। आर्थिक कठिनाई की स्थिति में सरल विधियों का भी उल्लेख धार्मिक परंपराओं में मिलता है। 

और एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए

यदि कोई व्यक्ति हिन्दू श्राद्ध परंपरा को नहीं मानना चाहता, तो वह अपनी व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के अनुसार निर्णय ले सकता है। लेकिन अपनी परंपरा से असहमति व्यक्त करने के लिए दूसरे धर्मों के मौलवी, पादरी या किसी अन्य धार्मिक व्यक्ति का उदाहरण देकर हिन्दू परंपरा का उपहास करना समाधान नहीं है।

हमारा संदेश किसी धर्म के मौलवी, पादरी या किसी अन्य धार्मिक समुदाय के प्रति अपमान का नहीं होना चाहिए। हम अपनी परंपरा का सम्मान अपने आचरण से करें।

हमें यह सवाल स्वयं से पूछना चाहिए—

जिस पिता ने हमें चलना सिखाया,

जिस माँ ने हमें जीवन दिया,

जिन दादा-दादी ने परिवार की नींव मजबूत की,

जिन पूर्वजों ने हमारे लिए अपना जीवन लगाया—

क्या उनके प्रति वर्ष में कुछ दिन श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना हमारे लिए इतना कठिन है?

पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं, परिवार की स्मृति को जीवित रखने का अवसर भी है।

यह वह समय है जब परिवार एक साथ बैठ सकता है, अपने दिवंगत परिजनों को याद कर सकता है, बच्चों को अपने पूर्वजों के बारे में बता सकता है और नई पीढ़ी को यह समझा सकता है कि परिवार केवल वर्तमान पीढ़ी का नाम नहीं है; उसके पीछे अनेक पीढ़ियों का त्याग और योगदान होता है।

मेरा आग्रह

🔸 अपनी परंपराओं को बिना समझे न छोड़ें।

🔸 धार्मिक कर्मकांड को दिखावे और आर्थिक दबाव का माध्यम न बनाएं।

🔸 योग्य एवं विश्वसनीय आचार्य से विधि समझकर श्राद्ध करें।

🔸 आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर कोई दबाव न डालें।

🔸 पूर्वजों की स्मृति में अन्नदान, गौसेवा, गरीबों की सहायता, वृक्षारोपण अथवा अन्य सेवा कार्य भी श्रद्धा के भाव से किए जा सकते हैं।

🔸 बच्चों और युवाओं को अपनी पारिवारिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का अर्थ समझाएँ।

🔸 किसी दूसरे धर्म या उसके अनुयायियों का अपमान किए बिना अपनी आस्था और परंपरा पर दृढ़ रहें।

हमें किसी दूसरे धर्म को नीचा दिखाकर हिन्दू बनने की आवश्यकता नहीं है।

हमें अपनी परंपरा को समझकर, सम्मानपूर्वक और विवेक के साथ निभाने की आवश्यकता है।

🚩 अंतिम संदेश

पितृपक्ष हमें यह सिखाता है कि मनुष्य अपनी जड़ों को न भूले।

परंपरा को बचाइए—लेकिन अंधानुकरण से नहीं, समझ के साथ।

श्रद्धा रखिए—लेकिन दिखावे के लिए नहीं, कृतज्ञता के साथ।

पूर्वजों को याद कीजिए—लेकिन केवल एक दिन नहीं, उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतारकर।

“जिस समाज को अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों और अपने संस्कारों का स्मरण रहता है, वह अपनी अगली पीढ़ी को केवल इतिहास नहीं, पहचान भी देता है।”

— हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 25 सितंबर 2026