पिछड़ा वर्ग सम्मेलन केवल चुनाव जीतने के लिए, वोट बैंक की राजनीति :अशोक विश्वकर्मा ।

वाराणसी ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि भारत में पिछड़ा वर्ग के लिए आयोजित राजनीतिक सम्मेलन केवल वोट बैंक बनाने और चुनाव जीतने की रणनीति है। सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के दावे करने वाले इन सम्मेलनों के बावजूद पिछड़ा वर्ग मुख्यधारा की राजनीति और सत्ता के शीर्ष में अब भी बहुत पीछे खड़ा ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यह वर्ग आज भी अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि राजनीतिक दल उन्हें मुख्य रूप से सिर्फ वोट बैंक के रूप में देखते हैं। देशभर में आगामी चुनाव के दृष्टिगत राजनीतिक दलों में पिछड़ा वर्ग को अपनी पार्टी का 'वोट बैंक' बनाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। जिसके चलते पिछड़ा वर्ग सम्मेलनों की बाढ़ आ गई है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा पिछड़ा वर्ग सम्मेलन केवल चुनाव जीतने की रणनीति है। यह पिछड़ा वर्ग को ऊपर उठाने का कोई वास्तविक राजनीतिक प्रयास नहीं है। राजनीतिक दलों में पिछड़ा वर्ग के नेतृत्व और टिकट वितरण में भारी कमी दिखाई पड़ती है। जबकि सम्मेलनों में पिछड़े वर्ग को एकजुट करने की बात करते हैं, लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उन्हें समानुपातिक प्रतिनिधित्व या टिकट नहीं मिलते हैं।अति पिछड़ों की उपेक्षा राजनीति में एक दस्तूर बन गई है जो लगातार जारी है।पिछड़ी जातियों में भी जो 'अति पिछड़ी' जातियां हैं, वह मुख्य ओबीसी समूह से भी ज्यादा उपेक्षित हैं। जिसके चलते अति पिछड़े वर्ग के लोग सर्वाधिक सामाजिक और आर्थिक असमानता के शिकार है।

मंडल कमीशन के बाद भी, सत्ता और प्रशासन के बड़े पदों (जैसे SSP, DM, IG, DIG) पर पिछड़े और दलितों का प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है। आरक्षण का भी राजनीतिकरण करके इसे एक राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। अदालती फैसलों द्वारा भी इसे कई बार रोका या सीमित किया गया है, जिससे इसका वास्तविक लाभ जरूरतमंदों तक कम पहुंचता है। विश्वविद्यालयों और उच्च प्रशासनिक पदों पर पिछड़ों और दलितों का प्रतिनिधित्व अभी भी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। पिछड़ा वर्ग सम्मेलन केवल चुनावी वादों और नारों तक सीमित रह जाते हैं। जब तक इन सम्मेलनों के माध्यम से सत्ता में भागीदारी, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के वास्तविक, जमीनी उपाय नहीं किए जाते, तब तक "पिछड़ा आज भी पीछे है" का नैरेटिव बना रहेगा।