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  • An important factual correction is needed on this issue. The statement that "the Constitution only respected Hindu women" is incorrect.

इस विषय पर तथ्यात्मक रूप से एक महत्वपूर्ण सुधार जरूरी है। यह कहना कि “संविधान ने केवल हिन्दू महिलाओं को सम्मान दिया”

सही नहीं है। हिन्दू विवाह और उत्तराधिकार संबंधी सुधार मुख्यतः 1950 के संविधान के बाद बनाए गए अलग-अलग कानूनों—जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955—के माध्यम से हुए। दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण न्यायिक और विधायी हस्तक्षेप भी हुए हैं। उदाहरण के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने Shah Bano मामले में मुस्लिम तलाकशुदा महिला के भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी और 2017 में Shayara Bano मामले में तत्काल तीन तलाक को अमान्य किया; 2019 के कानून ने इसे कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया। 

आपके विचार को राष्ट्रीय अध्यक्ष हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी के नाम से एक कड़ा लेकिन संवैधानिक और तथ्य-आधारित वक्तव्य इस रूप में रखा जा सकता है:

🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष वैचारिक एवं संवैधानिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

“महिला सम्मान किसी धर्म की सीमा में नहीं—समान अधिकार और समान कानून की बहस पूरे समाज के लिए होनी चाहिए”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 28 सितंबर 2026

आज एक प्रश्न बार-बार उठता है—

> “क्या संविधान ने केवल हिन्दू महिलाओं को ही समानता और सम्मान दिलाया? यदि संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, तो अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में अलग-अलग व्यवस्थाएँ क्यों बनी रहीं?”

यह प्रश्न गंभीर है और इसका उत्तर नारे से नहीं, बल्कि संविधान, कानून और न्यायपालिका के इतिहास को समझकर देना चाहिए।

⚖️ संविधान और महिला अधिकारों को अलग-अलग समझना होगा

सबसे पहले एक ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट होना चाहिए।

भारतीय संविधान ने किसी एक धर्म की महिलाओं को ही अधिकार देने का प्रावधान नहीं किया।

संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का सिद्धांत है तथा अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण देता है।

लेकिन भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार जैसे विषयों का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक व्यक्तिगत कानूनों से भी नियंत्रित होता रहा।

इसी कारण स्वतंत्र भारत में अलग-अलग समुदायों के पारिवारिक कानूनों में सुधार की गति और स्वरूप अलग रहे।

🕉️ हिन्दू कानूनों में क्या परिवर्तन हुए?

1955-56 के दौरान हिन्दू व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक विधायी सुधार हुए।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने हिन्दू विवाह व्यवस्था में एक-विवाह को कानूनी आवश्यकता बनाया और जीवित पति या पत्नी रहते दूसरी शादी को शून्य घोषित करने की व्यवस्था की। 

इसके बाद हिंदू उत्तराधिकार, दत्तक एवं भरण-पोषण तथा अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता से संबंधित कानून भी बनाए गए।

इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि—

> स्वतंत्र भारत में हिन्दू व्यक्तिगत कानूनों का व्यापक विधायी संहिताकरण और सुधार हुआ।

लेकिन यह पूरा परिवर्तन “संविधान ने केवल हिन्दू महिलाओं को सम्मान दिया” कहकर समझना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।

⚖️ फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का क्या हुआ?

यहाँ भी इतिहास को पूरा पढ़ना जरूरी है।

शाह बानो मामला — 1985

सर्वोच्च न्यायालय ने Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum मामले में कहा कि आर्थिक रूप से स्वयं का भरण-पोषण न कर पाने वाली तलाकशुदा मुस्लिम महिला को उस समय लागू सामान्य आपराधिक प्रक्रिया कानून की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार था। बाद की न्यायिक व्याख्याओं में इस अधिकार को और स्पष्ट किया गया। 

इसके बाद संसद ने 1986 में Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act बनाया।

बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने Danial Latifi मामले में इस कानून की ऐसी व्याख्या की कि तलाकशुदा महिला के लिए उचित और न्यायसंगत प्रावधान केवल इद्दत अवधि तक सीमित नहीं माना गया। 

इसलिए यह कहना कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर संविधान या न्यायपालिका ने कभी काम ही नहीं किया—तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा।

🚫 तीन तलाक पर क्या हुआ?

यहाँ स्थिति और भी स्पष्ट है।

2017 में सर्वोच्च न्यायालय के Shayara Bano v. Union of India निर्णय में तत्काल और एकतरफा तलाक-ए-बिद्दत (इंस्टेंट ट्रिपल तलाक) को असंवैधानिक/अमान्य ठहराया गया।

इसके बाद संसद ने Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 बनाया।

इस कानून की धारा 3 में तत्काल तीन तलाक को void and illegal घोषित किया गया और कानून में इसके लिए दंडात्मक प्रावधान भी हैं। 

अर्थात आज यह कहना कि—

> “तीन तलाक पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई”

तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

❓ फिर चार निकाह का प्रश्न क्यों बना हुआ है?

यहीं आपकी मूल बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आता है।

भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अंतर्गत मुस्लिम पुरुष द्वारा एक से अधिक विवाह का प्रश्न अभी भी अलग कानूनी स्थिति रखता है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 के तहत दो हिन्दुओं के बीच दूसरी शादी, जबकि पहला पति/पत्नी जीवित हो, शून्य है। 

वहीं मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के संदर्भ में बहुविवाह की वैधता का प्रश्न अलग कानूनी ढाँचे के अंतर्गत आता है। 2025 के एक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय में भी मुस्लिम पुरुष के बहुविवाह और राज्य द्वारा उसके विनियमन के प्रश्न को अलग कानूनी मुद्दों के रूप में समझाया गया। 

यही समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की बहस का एक महत्वपूर्ण आधार है।

प्रश्न यह है कि—

> क्या विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े मूल नागरिक अधिकारों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग कानूनी व्यवस्था बनी रहनी चाहिए, या भविष्य में समान नागरिक कानून होना चाहिए?

यह एक संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न है, जिसका समाधान लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया से होना है।

⚖️ निकाह हलाल