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मेडिकल कॉलेज में टेंडर घोटाले की आंच, पूर्व प्राचार्य पर चहेते को फायदा पहुंचाने के आरोपों की होगी जांच..??

नियमों को ताक पर रख 17 साल पुरानी बस को मिला ठेका, राजस्व हानि और जालसाजी के गंभीर आरोप

सुलतानपुर। राजकीय मेडिकल कॉलेज में बस टेंडर को लेकर बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. सलिल श्रीवास्तव पर आरोप है कि उन्होंने नियमों की अनदेखी कर अपने करीबी वेंडर को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से पूरी टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं कीं। मामला सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं और पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है।

जानकारी के मुताबिक बस टेंडर जेम पोर्टल के माध्यम से जारी किया गया था। नोटिफिकेशन में स्पष्ट रूप से वर्ष 2021 मॉडल की 52 से अधिक सीटों वाली बस मांगी गई थी, जिसके पास वैध आरसी, परमिट, बीमा और फिटनेस प्रमाणपत्र होना अनिवार्य था। लेकिन टेंडर से संलग्न पीडीएफ में वाहन का पंजीकरण वर्ष 2020 से पूर्व का न होने की शर्त जोड़ दी गई, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध नजर आने लगी।

मामले में अनुबंध अवधि को लेकर भी बड़ा खेल सामने आया है। जेम गाइडलाइन के अनुसार किसी अनुबंध को अधिकतम एक वर्ष तक ही बढ़ाया जा सकता है, जबकि टेंडर पीडीएफ में दो वर्ष तक विस्तार का प्रावधान रखा गया। आरोप है कि यदि प्रारंभ से ही दो वर्षों का टेंडर निकाला जाता तो बिड वैल्यू और जमानत राशि अधिक जमा करनी पड़ती। ऐसे में खास वेंडर को लाभ पहुंचाने के लिए जानबूझकर एक वर्ष का टेंडर जारी किया गया, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हुआ। सूत्रों का यह भी दावा है कि डॉ. सलिल श्रीवास्तव द्वारा संबंधित वेंडर को निजी स्वार्थवश लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अन्य कार्यों और टेंडरों में भी कथित रूप से प्राथमिकता दी गई। हालांकि यह पूरा मामला जांच का विषय है।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिस बस संख्या UP65AR7602 को टेंडर में शामिल किया गया, वह दिसंबर 2008 में पंजीकृत हुई थी और वर्तमान में लगभग 17 वर्ष 5 माह पुरानी बताई जा रही है। जबकि टेंडर की शर्तों के अनुसार अपेक्षाकृत नई बस की आवश्यकता थी। आरोप है कि इतनी पुरानी बस को नियमों की अनदेखी कर पात्र घोषित कर दिया गया।

वाहन संबंधी विवरणों के अनुसार बस का फिटनेस प्रमाणपत्र पहले मार्च 2026 तक वैध था, जबकि प्रदूषण प्रमाणपत्र नवंबर 2025 में फेल हो चुका था। इसके बावजूद 22 दिसंबर 2025 को उसी बस के लिए टेंडर जारी कर दिया गया। हालांकि मामला उजागर होने और खबरें प्रकाशित होने के बाद आनन-फानन में बस का फिटनेस एवं पॉल्यूशन प्रमाणपत्र अपडेट करा लिया गया। वर्तमान अभिलेखों के अनुसार वाहन का फिटनेस 1 मई 2027, टैक्स 31 मई 2026, बीमा 25 अगस्त 2026 तथा पीयूसीसी 27 अक्टूबर 2026 तक वैध दर्शाया जा रहा है।

सूत्रों का यह भी आरोप है कि पद छोड़ने से पहले डॉ. सलिल श्रीवास्तव ने अपने करीबी व्यक्ति को प्रभार सौंपा, ताकि उनके मनमाफिक कार्य आगे भी जारी रह सकें। पूरे प्रकरण ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि शासन और चिकित्सा शिक्षा विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। यदि निष्पक्ष जांच हुई तो टेंडर प्रक्रिया में बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता, नियमों की अनदेखी और कथित जालसाजी से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं.....!!