लखनऊ। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध कैसा रहा होगा यह युक्रेन और रसिया युद्ध में पुरी तरह समझ में नहीं आया, पर अमेरिका और ईरान युद्ध ने समझा दिया और यह साबित किया कि युद्ध के लिए हथियार एक साधन होता है और युद्ध हौसले से जीते जाते हैं। मंदिरों की पुरातन धरती और बाबा भोलेनाथ की सबसे प्रिय नगरी काशी से अजय कुमार यादव नें आगे कहा कि सवाल यह भी नहीं कि कौन हारा या कौन जीता? क्योंकि युद्ध में हार और जीत नहीं होती,बस किसी का कम नुकसान होता है और किसी का अधिक।
युद्ध किसी लोहे में लगी जंग की तरह होता है, उसे साफ करके जंगरोधी परत चढ़ाना जरुरी होता है जिससे लोहा अधिक समय तक सुरक्षित रहे। इसलिए "जंग और युद्ध" समानार्थी शब्द ही होते हैं। और अगर युद्ध में कफ़न बांध कर उतरा जाय, तो मरने वाला युद्ध जीत चूका होता है क्योंकि वो अपने लिए नहीं अपने देश के लिए, आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने को न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। कहां एक दिन पहले अमेरिका द्वारा ईरान की सभ्यता को मिटाने की बात चल रही थी और दूसरे दिन युद्ध विराम और ईरान के पुनर्निर्माण के सहयोग के लिए घोषणा। उन्होंने कहा कि जैसे अंगूलीमल और बुद्ध का मिलना। एक डकैत , अपहरण कर्ता अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर ईरान, डेनमार्क और फिर पूरी दुनिया को जितने चला था आज ईरान के सामने झुका तो नहीं पर ईरान की जनता, वहां की सोच को सलाम किया।
श्री अजय नें कहा यह ठीक वैसा ही था जैसा कि हमने सिकंदर और पोरस की लड़ाई का पढ़ा था, तथाकथित पोरस की हार पर सिकंदर ने पोरस से कहा कि बताओ पोरस तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाय तो पोरस ने नीडर होकर कहा कि जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। और वे एक बहुत अच्छे दोस्त बन जाते हैं और सिकंदर पोरष से जीता हुआ साम्राज्य पोरस को वापस कर देता है।
यह सीजफायर बहुत ही सम्मान के लायक है, कैसे हुआ, इस पर हम बात ना करें कि किसके twit पर शहबाज शरीफ ने एक दूसरे से बात करने का प्रयास किया, और युद्ध विराम हुआ,अगर यह युद्ध विराम स्थायी होता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान ईरान और अमेरिका का बहुत अच्छा संबंध बनेगा और हो सकता है कि आने वाला दस साल पाकिस्तान और ईरान का हो। और भारत के लिए सोचने का विषय। हो सकता है कि POK पर ईरान और अमेरिका का रूख़ पाकिस्तान के पक्ष में जाय। क्योंकि भारतीय जो है (बुरा मत मानना) उन्हें सस्ती चीजें चाहिए , देश के प्रति मर मिटने का जज्बा सिर्फ फिल्मों के गाने तक ही सीमित है। वैसे भी हम जातिवाद के भंवरजाल में फंसे हैं।
आखिर में उन्होंने कहा कि अगर इस युद्ध से बड़ा युद्ध इस साल नहीं होता है तो संभवतः इस साल का शांति का नोबेल पुरस्कार शहबाज शरीफ को मिल सकता है, वैसे अभी जल्दबाजी है कहना। पर भारत ने बहुत कुछ खोया, हम मूकदर्शक बने रहे। हम टेरिफ से डर गये। क्योंकि हमे सस्ती चीजें चाहिए,और सही भी है कि हमने इन सालों में हाईवे के अलावा कोई अध:संरचना जैसी कोई निर्माण ही नहीं की। बस हमने विकास यही समझा कि 10 साल पहले 200 रुपए में लिया गया प्लाट आज रु2500 का हो गया। दोस्तों अपने मुल्क से प्यार करो, सिर्फ उसके संसाधनों से नहीं उसकी आत्मा से।
आज ईरान की मानव श्रृंखला से मुझे हिमाचल का चिपको आंदोलन याद आ गया जिसके सुत्रधार सुंदरलाल बहुगुणा थे । वे झारखंड, छत्तीसगढ़ उड़ीसा के आदीवासी भी याद आ गये जो अपने जंगलों को कटने से बचाने के लिए पेड़ों से लिपट गये। सब कहते हैं कि प्यार का अंत नहीं होता। पर मैं कहता हूं बस प्यार का ही अंत होता है बस अपने आप को समर्पित कर दो, सौंप दो, बिना किसी इच्छा के।