🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष वैचारिक एवं सांस्कृतिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

उर्दूवुड’ का निपटारा करना होगा—लेकिन नफरत से नहीं, निष्पक्षता, संस्कृति और जवाबदेही के साथ!”

“विरोध किसी भाषा या धर्म का नहीं; विरोध उस मानसिकता का होना चाहिए जो भारतीय संस्कृति, आस्था और समाज के साथ दोहरे मापदंड अपनाए।”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

आज देश में हिंदी सिनेमा, OTT और डिजिटल मनोरंजन को लेकर एक गंभीर बहस चल रही है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदी फिल्म उद्योग के लिए “उर्दूवुड” जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं। यह शब्द आधिकारिक रूप से भारतीय फिल्म उद्योग का नाम नहीं है, बल्कि आलोचनात्मक और राजनीतिक विमर्श में इस्तेमाल होने वाला एक उपनाम है। 

लेकिन इस शब्द के पीछे उठाए जा रहे प्रश्नों को केवल नारे के रूप में खारिज करना भी उचित नहीं होगा।

हमें यह देखना होगा कि भारतीय मनोरंजन उद्योग में—

क्या सभी धर्मों और संस्कृतियों के साथ समान व्यवहार हो रहा है?

क्या हिंदू देवी-देवताओं, परंपराओं और धार्मिक भावनाओं के साथ भी वही संवेदनशीलता दिखाई जाती है जो अन्य समुदायों की धार्मिक भावनाओं के प्रति अपेक्षित है?

क्या फिल्मों और OTT में अश्लीलता, नशा, हिंसा और अपराध को अनावश्यक रूप से ग्लैमराइज किया जा रहा है?

क्या किसी समुदाय को बार-बार नकारात्मक और किसी अन्य समुदाय को बार-बार सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने जैसी प्रवृत्तियों की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या भारतीय सिनेमा को भारतीय समाज, संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जवाबदेह होना चाहिए?

मेरा स्पष्ट उत्तर है—हां।

लेकिन इसका समाधान किसी भाषा, धर्म या समुदाय को निशाना बनाना नहीं है।

🇮🇳 पहले यह समझना आवश्यक है—उर्दू कोई अपराध नहीं है

भारत की विविधता में हिंदी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम और अनेक भाषाओं का अपना स्थान है।

इसलिए उर्दू भाषा को किसी अपराध या सांस्कृतिक खतरे के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।

समस्या भाषा नहीं है।

समस्या तब पैदा होती है जब कोई भी भाषा, विचारधारा या सांस्कृतिक प्रभाव दूसरी संस्कृति को नीचा दिखाने, धार्मिक भावनाओं का अपमान करने या समाज में भेदभावपूर्ण प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने का माध्यम बन जाए।

इसी सिद्धांत को हिंदी पर भी लागू होना चाहिए।

यदि हिंदी के नाम पर किसी दूसरे धर्म, भाषा या समुदाय का अपमान किया जाए, तो उसका भी विरोध होना चाहिए।

न्याय का सिद्धांत एक ही होना चाहिए—सबके लिए समान।

🎬 सिनेमा समाज को प्रभावित करता है

फिल्म केवल मनोरंजन नहीं है।

फिल्म समाज की सोच को प्रभावित करती है।

एक बच्चा जो पर्दे पर बार-बार किसी व्यवहार को देखता है, वह उसे सामान्य मान सकता है।

एक युवा जिसे नशे, हिंसा या अपराध को आकर्षक तरीके से दिखाया जाता है, वह उसके प्रभाव में आ सकता है।

इसी प्रकार यदि किसी धर्म, समुदाय, जाति या वर्ग को लगातार एक ही नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो उसके प्रति सामाजिक धारणा भी प्रभावित हो सकती है।

इसलिए फिल्मकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है।

⚖️ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं है। संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता आदि से जुड़े आधारों पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। 

इसका अर्थ स्पष्ट है—

कलाकार को अपनी बात कहने का अधिकार है।

लेकिन समाज को यह प्रश्न पूछने का अधिकार भी है कि—

क्या सामग्री कानून के दायरे में है?

क्या उसमें किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा भड़काई जा रही है?

क्या धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान किया जा रहा है?

क्या बच्चों को अनुचित सामग्री परोसी जा रही है?

क्या अपराध और नशे का महिमामंडन किया जा रहा है?

क्या महिलाओं का वस्तुकरण किया जा रहा है?

क्या अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं?

स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं।

🚩 हिंदू आस्था के साथ भी समान संवेदनशीलता क्यों नहीं?

भारत की सनातन परंपरा अत्यंत विशाल और विविध है।

हमारे देवी-देवता, मंदिर, तीर्थ, महापुरुष, धार्मिक ग्रंथ, संत परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीक करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े हैं।

यदि किसी फिल्म या वेब सीरीज में किसी हिंदू धार्मिक प्रतीक का इस्तेमाल केवल मजाक, अपमान या विवाद पैदा करने के लिए किया जाता है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लेकिन यही सिद्धांत अन्य धर्मों पर भी लागू होना चाहिए।

जिस सम्मान की अपेक्षा हम अपनी आस्था के लिए करते हैं, वही सम्मान हमें दूसरों की आस्था के लिए भी स्वीकार करना चाहिए।

यही भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति है।

🔥 असल ‘निपटारा’ किसका होना चाहिए?

मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूं—

❌ किसी धर्म का निपटारा नहीं।

❌ किसी भाषा का निपटारा नहीं।

❌ किसी समुदाय का निपटारा नहीं।

❌ किसी कलाकार की धार्मिक पहचान का निपटारा नहीं।

✅ निपटारा होना चाहिए—दोहरे मापदंडों का।

✅ निपटारा होना चाहिए—अश्लीलता और अनावश्यक सनसनी का।

✅ निपटारा होना चाहिए—नशे और अपराध के महिमामंडन का।

✅ निपटारा होना चाहिए—धार्मिक आस्था के जानबूझकर अपमान का।

✅ निपटारा होना चाहिए—भेदभावपूर्ण और घृणा फैलाने वाली सामग्री का।

✅ निपटारा होना चाहिए—कानून से ऊपर समझने वाली मानसिकता का।

🇮🇳 सिनेमा में समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए

यदि किसी फिल्म में हिंदू धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक सामग्री पर विवाद होता है, तो उसकी समीक्षा उसी कानूनी कसौटी पर होनी चाहिए जिस कसौटी पर किसी अन्य धर्म से संबंधि