🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष सामाजिक एवं वैचारिक वक्तव्य 🚩🇮🇳

परिवार टूटेगा तो समाज कमजोर होगा—बाजार हो या विचारधारा, हमें अपनी सामाजिक एकता बचानी होगी”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

आज सोशल मीडिया पर एक वीडियो और उसके साथ यह विचार तेजी से सामने आ रहा है कि “परिवार तोड़ो, मुनाफा बढ़ाओ”—अर्थात आधुनिक बाजार व्यवस्था में ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें व्यक्ति अपने परिवार, समाज और सामुदायिक संबंधों से अलग होता जाए और उसकी निर्भरता बाजार पर बढ़ती जाए।

इस विचार में एक गंभीर सामाजिक प्रश्न छिपा हुआ है, जिस पर हमें भावनाओं से नहीं बल्कि विवेक, प्रमाण और सामाजिक अनुभव के आधार पर विचार करना चाहिए यह कहना उचित नहीं होगा कि हर व्यापार, हर कंपनी या पूरा बाजार परिवार तोड़ने की किसी गुप्त साजिश पर काम कर रहा है। लेकिन यह भी सच है कि अत्यधिक उपभोक्तावाद, दिखावे की संस्कृति, अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और लगातार बढ़ती व्यक्तिगततावादी जीवनशैली परिवार और समाज के पारंपरिक संबंधों को कमजोर कर सकती है

परिवार केवल चार दीवारों का नाम नहीं है

परिवार हमारी पहली सामाजिक संस्था है।

यहीं से बच्चा—

संस्कार सीखता है,

बड़ों का सम्मान सीखता है,

त्याग और सहयोग सीखता है,

जिम्मेदारी समझता है,

और समाज के प्रति अपने कर्तव्य को पहचानता है।

जब परिवार मजबूत होता है तो व्यक्ति अकेला नहीं होता।

लेकिन जब हर समस्या का समाधान केवल पैसा, बाजार और व्यक्तिगत सुविधा में खोजा जाने लगे, तब धीरे-धीरे रिश्तों का स्थान उपभोग ले सकता है।

यह परिवर्तन समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

बाजार जरूरी है, लेकिन बाजार जीवन का मालिक नहीं बन सकता

व्यापार और बाजार समाज के लिए आवश्यक हैं।

रोजगार, उत्पादन, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा और सुविधाओं के विकास में बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका है।

समस्या बाजार के अस्तित्व में नहीं है।

समस्या तब पैदा होती है जब—

मनुष्य बाजार के लिए नहीं, बल्कि बाजार मनुष्य के लिए होना चाहिए—यह मूल सिद्धांत उलट जाता है।

यदि हमारी खुशी का पैमाना केवल यह बन जाए कि हमने क्या खरीदा, हमारे पास कितना पैसा है और दूसरे व्यक्ति से हम कितने आगे हैं, तो जीवन की वास्तविक प्राथमिकताएँ पीछे छूट सकती हैं।

परिवार, स्वास्थ्य, संस्कार, प्रकृति, समाज और मानवीय संबंध किसी भी बाजार मूल्य से बड़े हैं।

“पशु तुल्य” होने की बात को भी हमें सही अर्थ में समझना चाहिए

किसी समाज को अपमानित करना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

लेकिन यदि मनुष्य केवल—

खाना, कमाना, खरीदना, उपभोग करना और मनोरंजन करना

ही जीवन का लक्ष्य बना ले तथा अपने सामाजिक और नैतिक दायित्वों को भूल जाए, तो यह निश्चित रूप से विचार करने का विषय है।

मनुष्य की श्रेष्ठता केवल उसकी आर्थिक क्षमता में नहीं है।

उसकी श्रेष्ठता उसके विवेक, करुणा, संयम, संस्कार, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान में है।

परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र बनता है

एक मजबूत परिवार → मजबूत समाज।

मजबूत समाज → मजबूत राष्ट्र।

इसीलिए हमें परिवार को केवल निजी विषय मानकर छोड़ नहीं देना चाहिए।

आज आवश्यकता है कि—

👨‍👩‍👧‍👦 परिवार में संवाद बढ़े।

🏡 बुजुर्गों का सम्मान हो।

👦 बच्चों को संस्कार और जिम्मेदारी दी जाए।

📱 डिजिटल दुनिया के साथ वास्तविक रिश्तों को भी समय दिया जाए।

💰 आवश्यकता और लालच के बीच अंतर समझा जाए।

🤝 पड़ोसी और समुदाय के साथ सहयोग की भावना बढ़े।

🌱 गांव और शहर दोनों में सामाजिक सहभागिता मजबूत हो।

लेकिन सामाजिक विघटन का दोष किसी एक समुदाय पर नहीं डाला जा सकता

कुछ लोग सामाजिक समस्याओं के लिए “जेहादी”, “वामपंथी”, “मिशनरी” या किसी अन्य समूह को एक साथ जिम्मेदार ठहराने लगते हैं।

ऐसे व्यापक आरोपों से बचना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति या संगठन हिंसा, जबरन धर्मांतरण, कट्टरता, घृणा या गैरकानूनी गतिविधि में शामिल है, तो उसके विरुद्ध प्रमाण के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन किसी पूरे धर्म, विचारधारा या समुदाय को सामूहिक रूप से अपराधी बताना न तो न्यायसंगत है और न ही सामाजिक एकता के लिए उपयोगी।

हमें कट्टरता का विरोध करना है, नागरिकों का नहीं।

हमें हिंसा का विरोध करना है, किसी समुदाय का नहीं।

हमें घृणा की राजनीति का विरोध करना है, भारतीय नागरिकों का नहीं।

एकजुटता का अर्थ दूसरों से नफरत करना नहीं है

हम जब कहते हैं कि परिवार और समाज एकजुट रहें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम दूसरे धर्म या समुदाय के लोगों से दूरी बना लें।

सच्ची सामाजिक एकता का अर्थ है—

अपने परिवार को मजबूत करना,

अपने समाज के प्रति जिम्मेदार होना,

दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना,

और कानून के सामने समानता स्वीकार करना।

भारत की शक्ति उसकी विविधता के साथ सह-अस्तित्व में है।

हमारी लड़ाई किससे है?

हमारी लड़ाई—

❌ उपभोक्तावाद से है, उपभोक्ता से नहीं।

❌ परिवार-विरोधी सोच से है, किसी परिवार से नहीं।

❌ हिंसक कट्टरता से है, किसी धर्म के निर्दोष नागरिक से नहीं।

❌ सामाजिक विघटन से है, किसी समुदाय से नहीं।

❌ अंधी नकल से है, आधुनिकता से नहीं।

❌ शोषणकारी व्यवहार से है, वैध व्यापार से नहीं।

मेरा स्पष्ट आह्वान

आज प्रत्येक परिवार स्वयं से कुछ प्रश्न पूछे—

क्या हम अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे रहे हैं?

क्या हमारे घर में संवाद है?

क्या हम केवल कमाने और खर्च करने की मशीन तो नहीं बन रहे?

क्या हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और इतिहास से परिचित हैं?

क्या हम बुजुर्गों को बोझ समझने लगे हैं?

क्या सोशल मीडिया ने हमारे वास्तविक रिश्तों की जगह ले ली है?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर हमें असहज करता है, तो बदलाव की शुरुआत दूसरों को दोष देने से नहीं, स्वयं से करनी होगी।

आइए, परिवार से राष्ट्र निर्माण की शुरुआत करें

परिवार जोड़िए।

समाज जोड़िए।

गांव जोड़िए।

शहर जोड़िए।

युवा