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इस विषय पर एक तथ्याधारित और धार्मिक मतभेदों को स्पष्ट करने वाला वक्तव्य इस तरह बनाया जा सकता है।

इस विषय पर एक तथ्याधारित और धार्मिक मतभेदों को स्पष्ट करने वाला वक्तव्य इस तरह बनाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण सुधार यह है कि “अरब में एक भी कब्रिस्तान नहीं है” कहना गलत है—सऊदी अरब के सरकारी स्रोत स्वयं अनेक कब्रिस्तानों, विशेषकर अल-बक़ी और अल-मुअल्ला, का उल्लेख करते हैं और कब्रिस्तान की सरकारी सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। 

🇮🇳🚩 राष्ट्रीय अध्यक्ष का विशेष वैचारिक एवं तथ्याधारित वक्तव्य 🚩🇮🇳

“मज़ार, दरगाह और पक्के कब्रिस्तान: धार्मिक मान्यता, इतिहास और सार्वजनिक भूमि का प्रश्न”

हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी

राष्ट्रीय अध्यक्ष

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत | 27 सितंबर 2026

🇮🇳 प्रश्न भावनाओं का नहीं, तथ्य और कानून का होना चाहिए

आज सोशल मीडिया पर यह बात कही जाती है—

> “मज़ार बनाना और मज़ार पर जाना हराम है, इसलिए अरब में एक भी नहीं है।

दरगाह बनाना और दरगाह पर जाना हराम है, इसलिए अरब में एक भी नहीं है।

पक्का कब्रिस्तान बनाना और पक्के कब्रिस्तान पर जाना हराम है, इसलिए अरब में एक भी नहीं है।”

इसके बाद प्रश्न पूछा जाता है—

> “जब अरब में ऐसी धार्मिक संरचनाओं को लेकर अलग धार्मिक दृष्टिकोण है, तो भारत में मज़ार, दरगाह और कब्रिस्तानों की संख्या और निर्माण को लेकर क्या स्थिति है?”

यह प्रश्न उठाया जा सकता है, लेकिन इसका उत्तर धार्मिक नारे से नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत, सरकारी रिकॉर्ड, भूमि कानून और न्यायिक निर्णयों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

1. 🇸🇦 सबसे पहले एक जरूरी तथ्य-सुधार

यह कहना कि “अरब में एक भी कब्रिस्तान नहीं है” बिल्कुल गलत है।

सऊदी अरब के सरकारी स्रोत अल-बक़ी को मदीना का ऐतिहासिक और प्रमुख कब्रिस्तान बताते हैं। सरकारी जानकारी के अनुसार वहाँ सदियों से लोगों को दफनाया जाता रहा है। 

सऊदी सरकार की आधिकारिक सेवाओं में नागरिकों को कब्रिस्तान खोजने और कब्रिस्तान आरक्षित करने की सुविधा भी उपलब्ध है। 

इसलिए वास्तविक प्रश्न कब्रिस्तान के अस्तित्व का नहीं, बल्कि यह है कि कब्र पर किस प्रकार की संरचना बनाई जाए और मृत व्यक्ति की कब्र को धार्मिक स्मारक या इबादत की जगह बनाया जाए या नहीं।

2. 🕌 मज़ार, दरगाह और कब्रिस्तान एक ही चीज नहीं हैं

इन तीनों शब्दों को अलग समझना जरूरी है।

कब्रिस्तान — वह स्थान जहाँ मृतकों को दफनाया जाता है।

कब्र/मज़ार — किसी व्यक्ति की दफन जगह; भारत में “मज़ार” शब्द अक्सर किसी धार्मिक रूप से सम्मानित व्यक्ति की कब्र के लिए इस्तेमाल होता है।

दरगाह — आम तौर पर किसी सूफी संत या धार्मिक व्यक्तित्व की कब्र से जुड़े धार्मिक स्थल/परिसर के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।

इसलिए हर कब्रिस्तान को दरगाह कहना और हर दरगाह को सामान्य कब्रिस्तान मान लेना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं 

3. 📖 इस्लामी धार्मिक मत में भी महत्वपूर्ण अंतर है

यह भी कहना उचित नहीं होगा कि “सभी मुसलमान एक ही विचार रखते हैं।”

इस विषय पर इस्लामी परंपराओं और विद्वानों में मतभेद रहे हैं।

विशेष रूप से सऊदी धार्मिक संस्थानों से जुड़े आधिकारिक फतवों में कब्रों पर भवन बनाने और कब्रों को इबादत की जगह बनाने के विरुद्ध कठोर मत व्यक्त किया गया है। सऊदी धार्मिक स्रोत में कब्रों के ऊपर मस्जिद/धार्मिक संरचना बनाने से बचने की बात कही गई है।सऊदी धार्मिक फतवा-साहित्य में सीमेंट/कंक्रीट से कब्रों को पक्का बनाने तथा कब्र के ऊपर संरचना बनाने के संबंध में भी प्रतिबंधात्मक मत दर्ज है लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दुनिया के हर मुस्लिम समाज में वही प्रशासनिक और धार्मिक व्यवस्था लागू है।

4. 🇮🇳 भारत की स्थिति अलग क्यों दिखाई देती है?

भारत एक बहुधार्मिक और संवैधानिक गणराज्य है।

यहाँ विभिन्न धार्मिक समुदायों की धार्मिक संस्थाएँ और परंपराएँ कानून के अधीन संचालित होती हैं।

भारत में मुस्लिम धार्मिक एवं धर्मार्थ संपत्तियों के प्रशासन के लिए वक्फ संबंधी कानून और राज्य-स्तरीय नियम भी मौजूद हैं। India Code में वक्फ कानून के अंतर्गत दर्गाह, कब्रिस्तान और अन्य संबंधित धार्मिक संपत्तियों का उल्लेख मिलता है। 

उत्तर प्रदेश के 2024 के वक्फ नियमों में भी दर्गाह, कब्र, कब्रिस्तान, खानकाह, मकबरा, मस्जिद और मकबरे जैसी श्रेणियों को वक्फ परिसर की परिभाषा में शामिल किया गया है। 

अर्थात भारत में ऐसी संपत्तियों का अस्तित्व केवल अनौपचारिक सामाजिक व्यवस्था का विषय नहीं है; उनका एक कानूनी और प्रशासनिक ढाँचा भी है।

5. ⚖️ असली प्रश्न — निर्माण कहाँ और किस भूमि पर हो रहा है?

यहीं से सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शुरू होता है।

यदि कोई कब्रिस्तान या धार्मिक स्थल कानूनी रूप से दर्ज भूमि पर है, तो उसका प्रश्न अलग है।

लेकिन यदि कोई धार्मिक संरचना—

सरकारी भूमि पर,

सार्वजनिक सड़क पर,

फुटपाथ पर,

हाईवे की भूमि पर,

पार्क में,

सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर,

या बिना आवश्यक अनुमति के

बनाई गई है, तो मामला धर्म से आगे बढ़कर भूमि और प्रशासनिक कानून का विषय बन जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर अनधिकृत धार्मिक संरचनाओं की पहचान के संबंध में राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को कार्रवाई के लिए निर्देश दिए थे। 

इसलिए यही कसौटी मंदिर, मस्जिद, दरगाह, मजार, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धार्मिक संरचना पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

6. 🏛️ हाल के न्यायिक मामलों से क्या पता चलता है?

गुजरात हाईकोर्ट के एक 2025 के मामले में एक दर्गाह/मज़ार की भूमि, उसके पुराने अस्तित्व, वक्फ रिकॉर्ड और सरकारी भूमि रिकॉर्ड को लेकर विवाद सामने आया। अदालत के सामने यह भी तथ्य रखा गया कि अलग-अलग सरकारी अभिलेखों में उस स्थान की स्थिति अलग प्रकार से दर्ज थी। 

यह उदाहरण बताता है कि किसी धार्मिक स्थल के बारे में केवल यह कहना कि—

> “यह बहुत पुराना है”