कुछ लोग केवल फिल्में नहीं बनाते, वे अपने समय, समाज और मिट्टी की स्मृतियों को सहेजते हैं। नागपुरी सिनेमा के संवेदनशील निर्देशक, रंगकर्मी और सांस्कृतिक हस्ताक्षर अनिल सिकदर ऐसे ही कलाकार थे। उनके जाने की खबर केवल एक व्यक्ति के निधन की सूचना नहीं, बल्कि झारखंड की लोकसंस्कृति की उस धड़कन के थम जाने जैसी है, जो वर्षों से गांवों, लोकगीतों और आम लोगों की कहानियों को परदे तक पहुंचाती रही।
अनिल सिकदर उन लोगों में थे जिन्होंने तब नागपुरी सिनेमा का हाथ थामा, जब इस क्षेत्रीय फिल्म उद्योग के पास न बड़े संसाधन थे, न बड़ा बाजार और न ही पर्याप्त मंच। लेकिन उनके पास एक चीज भरपूर थी—अपनी मिट्टी से प्रेम। यही प्रेम उनकी फिल्मों में दिखाई देता था। उनकी फिल्मों में चमक-दमक से ज्यादा गांव की पगडंडियां थीं, खेतों की हरियाली थी, लोकधुनों की मिठास थी और रिश्तों की सादगी थी। दर्शकों को उनकी फिल्मों में अभिनय से ज्यादा अपना जीवन नजर आता था।
झारखंड के सरिया क्षेत्र से जुड़े अनिल सिकदर ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कला और रंगमंच को समर्पित किया। वे केवल निर्देशक नहीं थे, बल्कि ऐसे सांस्कृतिक कर्मी थे जो मानते थे कि कला समाज को जोड़ने का माध्यम है। नुक्कड़ नाटक हो, मंचीय प्रस्तुति हो या फिल्म—हर माध्यम में उन्होंने झारखंडी अस्मिता को केंद्र में रखा। वे अक्सर कहा करते थे कि “भाषा और संस्कृति बची रहेगी, तभी समाज अपनी पहचान बचा पाएगा।”
उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उनमें बनावट नहीं थी। सब कुछ बेहद अपना और सहज लगता था। “झारखंड कर छैला”, “हमर झारखंड”, “तोर नाम”, “संगीया”, “प्रीत के बंधन” और “मोर गांव मोर देस” जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने नागपुरी सिनेमा को एक नई दिशा देने की कोशिश की। इन फिल्मों में लोकसंस्कृति, प्रेम, संघर्ष, पारिवारिक संबंध और गांव की आत्मा साफ दिखाई देती थी।
उनकी फिल्मों के गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। “माटी कर खुशबू रे, दिल में बसल तोर गांव...”
जैसी पंक्तियां केवल गीत नहीं थीं, बल्कि उनकी सोच का विस्तार थीं। वहीं “तोर बिना सूना लागे मोर संसार...” जैसे गीत आज उनके चाहने वालों की भावनाओं को भी व्यक्त करते प्रतीत होते हैं। वे जानते थे कि क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति को बचाने का सबसे बड़ा रास्ता है—उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना। इसलिए उन्होंने अपने सिनेमा को पूरी तरह स्थानीय जीवन से जोड़े रखा।
अनिल सिकदर की एक और बड़ी पहचान थी—नए कलाकारों को अवसर देना। आज नागपुरी सिनेमा और रंगमंच से जुड़े कई कलाकार ऐसे हैं, जिन्होंने उनके साथ काम करते हुए अपने सफर की शुरुआत की। वे कलाकारों की गलतियों पर डांटते जरूर थे, लेकिन उतनी ही आत्मीयता से उनका हौसला भी बढ़ाते थे। उनके लिए कलाकार केवल “एक्टर” नहीं, परिवार का हिस्सा होते थे। यही कारण था कि लोग उन्हें निर्देशक से ज्यादा एक अभिभावक के रूप में याद करते हैं।
रांची दूरदर्शन से जुड़े रहते हुए भी उन्होंने झारखंडी संस्कृति को व्यापक मंच देने का काम किया। उन्होंने यह साबित किया कि क्षेत्रीय कला केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की क्षमता है। वे रंगमंच और फिल्मों के बीच एक मजबूत सेतु थे।
आज जब मनोरंजन उद्योग तेजी से बाजार और ट्रेंड के हिसाब से बदल रहा है, ऐसे समय में अनिल सिकदर जैसे कलाकारों की याद और भी जरूरी हो जाती है। उन्होंने सिनेमा को कभी सिर्फ व्यापार नहीं माना। उनके लिए सिनेमा समाज का दस्तावेज था—ऐसा दस्तावेज जिसमें गांव की बोली, लोकगीत, संघर्ष, प्रेम और संस्कृति सुरक्षित रह सके।
उनके निधन के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आता है—क्या हम अपने क्षेत्रीय कलाकारों को वह सम्मान और सुरक्षा दे पा रहे हैं, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं? नागपुरी सिनेमा लंबे समय से सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों से जूझता रहा है। इसके बावजूद अनिल सिकदर जैसे कलाकारों ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने जुनून और प्रतिबद्धता से यह साबित किया कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े बजट नहीं, बड़ा दिल चाहिए।
आज की युवा पीढ़ी तेजी से वैश्विक संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है। ऐसे दौर में अनिल सिकदर जैसे कलाकार हमें अपनी जड़ों की याद दिलाते हैं। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से यह संदेश दिया कि अपनी मिट्टी से जुड़कर ही कोई समाज मजबूत बन सकता है।
उनका जाना नागपुरी सिनेमा के लिए अपूरणीय क्षति है। लेकिन सच यह भी है कि कलाकार कभी पूरी तरह विदा नहीं होते। वे अपनी रचनाओं, अपने विचारों और उन लोगों में जीवित रहते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेरित किया हो। अनिल सिकदर भी अपनी फिल्मों, गीतों, नाटकों और उन अनगिनत कलाकारों के माध्यम से हमेशा याद किए जाएंगे, जिन्हें उन्होंने मंच दिया।
आज जरूरत इस बात की है कि झारखंड सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और समाज मिलकर ऐसे कलाकारों की विरासत को सहेजें। नागपुरी फिल्मों और क्षेत्रीय कला के विकास के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं, ताकि अनिल सिकदर जैसे कलाकारों का सपना अधूरा न रह जाए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
झारखंड की मिट्टी का यह सच्चा कलाकार अब हमारे बीच भले न हो, लेकिन उसकी बनाई सांस्कृतिक रोशनी आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक रास्ता दिखाती रहेगी।