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व्यक्तिपूजा का विरोध आवश्यक है, लेकिन इतिहास को भी व्यक्तिद्वेष का शिकार नहीं बनाया जा सकता

राष्ट्रीय अध्यक्ष हिंदू देव प्रकाश शुक्ला

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

इतिहास किसी व्यक्ति की पूजा का विषय नहीं है और न ही किसी व्यक्ति को पूर्णतः दोषी ठहराकर इतिहास को समझा जा सकता है। इतिहास का मूल्यांकन तथ्यों, परिस्थितियों, उपलब्ध प्रमाणों और उस समय के राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों के आधार पर होना चाहिए महात्मा गांधी के संबंध में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए।

गांधी जी की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। खिलाफत आंदोलन से कांग्रेस को जोड़ने, असहयोग आंदोलन की रणनीति, चौरीचौरा के बाद आंदोलन वापस लेने, 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन—इन सभी पर गंभीर ऐतिहासिक बहस हो सकती है। लेकिन इन घटनाओं को सीधे इस निष्कर्ष में बदल देना कि गांधी जी का “निजी मकसद” कांग्रेस पर स्थायी कब्जा करना था और अंततः उन्हीं की वजह से भारत का विभाजन हुआ, इतिहास की जटिलता को एक व्यक्ति तक सीमित कर देना है 1. 1920 का प्रश्न : गांधी जी का उद्देश्य केवल कांग्रेस पर कब्जा था 1920 का दौर भारतीय राजनीति में निर्णायक परिवर्तन का समय था। यह सही है कि गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं के साथ राजनीतिक सहयोग किया और असहयोग आंदोलन को उससे जोड़ा। स्वयं गांधी जी ने बाद में नागपुर अधिवेशन के संदर्भ में लिखा कि खिलाफत के समर्थन में असहयोग को अपनाना हिंदू-मुस्लिम एकता की दिशा में एक व्यावहारिक प्रयास था यह नीति आज के दृष्टिकोण से विवादास्पद मानी जा सकती है। खिलाफत मूलतः एक धार्मिक-राजनीतिक प्रश्न था और उसके नेतृत्व में मौलवी वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आगे चलकर इस गठबंधन के भीतर गंभीर तनाव और हिंसक घटनाएँ भी हुईं लेकिन किसी पुस्तक के कुछ पृष्ठों में गांधी जी की रणनीतिक सोच का वर्णन मिल जाना अपने-आप यह प्रमाणित नहीं करता कि उनका “असली और निजी मकसद” केवल कांग्रेस के शीर्ष पर कब्जा करना था इतिहास में राजनीतिक परिणाम और निजी उद्देश्य दो अलग बातें हैं गांधी जी ने कांग्रेस को जनसंगठन में बदलने में असाधारण भूमिका निभाई। 1920 के बाद कांग्रेस का संगठन गांवों, कस्बों और व्यापक जनसमुदाय तक फैलाया गया। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के ऐतिहासिक विवरण में भी इस परिवर्तन को कांग्रेस के अभिजात एवं सीमित राजनीतिक संगठन से व्यापक जनसंगठन बनने की प्रक्रिया के रूप में दर्ज किया गया है इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि 1920 गांधी युग के राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत थी, लेकिन इसे केवल व्यक्तिगत सत्ता-लालसा का प्रमाण मानना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देता है 2. जिन्ना और गांधी : केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि मोहम्मद अली जिन्ना 1910 के दशक में संवैधानिक राजनीति और हिंदू-मुस्लिम सहयोग के समर्थक प्रमुख नेताओं में थे। 1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

लेकिन 1920 के बाद कांग्रेस की राजनीति का चरित्र बदल गया। जिन्ना जन-आंदोलन, बहिष्कार और असहयोग की गांधीवादी पद्धति से असहमत थे। सितंबर से दिसंबर 1920 के बीच कांग्रेस के भीतर इस प्रश्न पर तीखा संघर्ष हुआ और नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम स्वीकार किया गया इसका परिणाम जिन्ना के कांग्रेस से अलग होने के रूप में सामने आया यह गांधी और जिन्ना के बीच वास्तविक राजनीतिक मतभेद था। लेकिन यह कहना कि गांधी ने केवल जिन्ना को हटाने के लिए पूरा आंदोलन खड़ा किया, प्रमाण की अपेक्षा करता है 3. खिलाफत और मोपला हिंसा : गांधी की नीति की गंभीर आलोचना होनी चाहिए यह वह क्षेत्र है जहाँ गांधी जी की आलोचना से बचना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा 1921 का मालाबार और मोपला विद्रोह अत्यंत हिंसक और त्रासद घटना थी। इसमें बड़े पैमाने पर हत्या, लूट, विस्थापन और धार्मिक हिंसा हुई। हिन्दू समाज को भी भारी पीड़ा झेलनी पड़ी लेकिन यहाँ भी दो बातों को अलग रखना आवश्यक है पहली, मोपला हिंसा वास्तविक और निंदनीय थी दूसरी, उस पूरी हिंसा को केवल गांधी जी द्वारा खिलाफत के समर्थन का सीधा और एकमात्र परिणाम बताना इतिहास की अनेक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और औपनिवेशिक परिस्थितियों की उपेक्षा करना होगा गांधी जी की उस समय की प्रतिक्रियाओं की आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए। यदि किसी समुदाय के विरुद्ध हिंसा हुई तो राष्ट्रवादी नेतृत्व से स्पष्ट और समान नैतिक प्रतिक्रिया की अपेक्षा स्वाभाविक है लेकिन किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की गलत प्रतिक्रिया और उस घटना का पूर्ण कारण—दोनों एक ही बात नहीं हैं 4. चौरीचौरा और असहयोग आंदोलन की वापसी चौरीचौरा के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया। यह निर्णय आज भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे विवादित निर्णयों में से एक है आलोचक सही प्रश्न पूछ सकते हैं कि जब देशव्यापी आंदोलन अपने चरम पर था, तब क्या एक स्थानीय हिंसक घटना के कारण पूरे आंदोलन को रोकना उचित था लेकिन गांधी जी के लिए अहिंसा केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि आंदोलन का मूल सिद्धांत थी। इसलिए उनके निर्णय को समझने के लिए उनके राजनीतिक दर्शन को भी समझना पड़ेगा उनसे असहमति हो सकती है; लेकिन उनके निर्णय को केवल “राजनीतिक स्वार्थ” कह देना पर्याप्त ऐतिहासिक विश्लेषण नहीं है 5. गांधी जी का कांग्रेस पर प्रभाव—यह आलोचना अधिक मजबूत है यहाँ आलोचना का एक महत्वपूर्ण आधार अवश्य है 1920 के बाद कांग्रेस की राजनीति में गांधी जी का प्रभाव इतना व्यापक हो गया कि संगठन के बड़े निर्णयों पर उनका मत निर्णायक बन गया। बाद के वर्षों में कांग्रेस अध्यक्षों और कार्यसमिति की राजनीति में भी गांधी जी का प्रभाव असाधारण था  लेकिन यह कहना कि “हर वर्ष कांग्रेस अध्यक्ष और कार्यसमिति के सारे सदस्य उनके व्यक्तिगत चयन से होते रहे” एक अत्यधिक व्