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  • Your opinion can be countered in a firm but factual manner in favor of Hindu tradition. I have slightly corrected some exaggerated claims, so that it is not easy to question the article factually.

आपके दिए हुए विचार का जवाब हिंदू परंपरा के पक्ष में दृढ़ लेकिन तथ्यात्मक तरीके से इस रूप में रखा जा सकता है। मैंने इसमें कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण दावों को थोड़ा ठीक किया है, ताकि लेख पर तथ्यात्मक सवाल उठाना आसान न हो।

धर्म की पहचान नारों से नहीं, उसके विचार और जीवन-दृष्टि से होती है स्त्री सम्मान, धार्मिक परंपराएं और हिंदू सभ्यता पर एक तथ्यात्मक विमर्श राष्ट्रीय अध्यक्ष हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा आज सोशल मीडिया पर महिलाओं के वस्त्र, धार्मिक आस्थाओं और स्त्री-स्वतंत्रता को लेकर अनेक तस्वीरें और दावे सामने आते हैं। किसी महिला के सिर पर घूंघट या धार्मिक आवरण देखकर तुरंत यह निष्कर्ष निकाल देना कि कौन-सा धर्म स्त्री को कितना स्वतंत्र रखता है—इतिहास और समाज, दोनों को बहुत सरल बना देना है लेकिन यदि हम धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के वास्तविक निर्देशों को पढ़ें, तो एक गंभीर और सार्थक बहस अवश्य शुरू हो सकती है ईसाई परंपरा में सिर ढकने का प्रश्न वास्तव में ग्रंथ में मिलता है नए नियम के 1 Corinthians 11:2–16 में संत पॉल महिलाओं के प्रार्थना/भविष्यवाणी के संदर्भ में सिर ढकने की बात करते हैं। पाठ में यह भी कहा गया है कि यदि महिला सिर नहीं ढकती तो उसके बाल काटे जाने या सिर मुंडाए जाने की बात आती है इसलिए यह कहना उचित है कि ईसाई धर्मग्रंथ में महिलाओं के सिर ढकने से संबंधित स्पष्ट धार्मिक निर्देश मौजूद है लेकिन यहां भी तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है यह कहना सही नहीं होगा कि “हर कैथोलिक नन इसलिए सिर से पैर तक शरीर ढकती है क्योंकि केवल यही बाइबिल का आदेश है।” कैथोलिक धार्मिक समुदायों में पोशाक और धार्मिक वेशभूषा अलग-अलग परंपराओं के अनुसार रही है। इसलिए ग्रंथ के निर्देश और बाद की धार्मिक संस्थागत परंपराओं को एक ही चीज मानना उचित नहीं है इस्लामी परंपरा में भी पर्दे और आवरण की धार्मिक परंपरा मौजूद है इस्लामी हदीस साहित्य में महिलाओं के वस्त्र और आवरण से संबंधित निर्देश मिलते हैं उदाहरण के लिए सहीह अल-बुखारी में आयशा से संबंधित एक रिवायत में कुरआन की आयत के संदर्भ में महिलाओं द्वारा सिर और शरीर के हिस्सों को ढकने का उल्लेख मिलता है एक अन्य बुखारी रिवायत में ईद के धार्मिक आयोजन में महिलाओं के लिए जिलबाब उपलब्ध कराने का उल्लेख मिलता है इसलिए मुस्लिम समाज में हिजाब, पर्दा और धार्मिक आवरण की परंपरा को केवल आधुनिक राजनीतिक निर्माण बताना भी सही नहीं होगा लेकिन इस्लाम के भीतर भी हिजाब, नकाब, बुर्का और चेहरे के आवरण की व्याख्या तथा व्यवहार अलग-अलग समाजों और धार्मिक परंपराओं में अलग रहे हैं तो क्या हिंदू धर्म में पर्दा प्रथा का कोई अस्तित्व ही नहीं था यहीं सबसे महत्वपूर्ण तथ्य-संशोधन आवश्यक है यह कहना कि “पूरे हिंदू धर्म में कहीं भी पर्दा या घूंघट नहीं मिलता”, ऐतिहासिक रूप से बहुत व्यापक दावा है भारतीय समाज के अनेक हिस्सों में घूंघट और पर्दा जैसी प्रथाएं रही हैं। उदाहरण के लिए सामाजिक इतिहास पर शोध में उत्तर भारत के हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में पर्दा/घूंघट की प्रथाओं का अध्ययन मिलता है राजपूत समाज में पर्दा और स्त्री के सामाजिक आवागमन पर नियंत्रण से संबंधित ऐतिहासिक अध्ययन भी उपलब्ध हैं इसलिए हमें यह नहीं कहना चाहिए कि “हिंदू समाज में कभी पर्दा था ही नहीं।” सही बात यह है कि हिंदू धर्मग्रंथों और हिंदू सभ्यता की विशाल परंपरा को किसी एक सार्वभौमिक ‘पर्दा आदेश’ में समेटना कठिन हैभारत के अलग-अलग क्षेत्रों, जातीय समूहों और कालखंडों में महिलाओं के वस्त्र और सामाजिक व्यवहार की परंपराएं अलग रही हैं यही हिंदू परंपरा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है हिंदू सभ्यता को समझने के लिए केवल एक ग्रंथ या एक केंद्रीय धार्मिक प्राधिकारी की तलाश करना कठिन है यहां वेद हैंउपनिषद हैं रामायण है महाभारत हैगीता है पुराण हैं धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र हैं भक्ति परंपरा है तांत्रिक परंपराएं हैं लोक परंपराएं हैं असंख्य क्षेत्रीय और दार्शनिक परंपराएं हैं  इसी विशालता में स्त्री की भूमिका भी अनेक रूपों में दिखाई देती है गार्गी और मैत्रेयी को भूलकर भारतीय परंपरा को कैसे समझेंगे वैदिक और उपनिषदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं का उल्लेख भारतीय बौद्धिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है भारतीय परंपरा में स्त्री केवल परिवार की भूमिका तक सीमित प्रतीक नहीं रही वह विदुषी भी रही, दार्शनिक भी रही, कवयित्री भी रही, शक्ति की उपास्य भी रही, राजनीतिक और सामाजिक कथाओं की प्रमुख पात्र भी रही यही कारण है कि भारतीय धार्मिक कल्पना में देवी की अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती जैसी देवियों की आराधना भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है अर्धनारीश्वर की अवधारणा क्या संदेश देती है भारतीय दर्शन में अर्धनारीश्वर का प्रतीक अत्यंत गहरा है यह केवल एक धार्मिक मूर्ति नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के परस्पर संबंध का दार्शनिक प्रतीक है यह विचार हमें बताता है कि भारतीय चिंतन में पुरुष और स्त्री को केवल दो विरोधी सत्ता के रूप में देखने के बजाय परस्पर पूरक तत्वों के रूप में भी देखा गया है लेकिन इसका अर्थ यह निकालना भी सही नहीं होगा कि प्राचीन भारतीय समाज में हर महिला को हर काल में पूर्ण सामाजिक समानता प्राप्त थी दर्शन में आदर्श और समाज में वास्तविक स्थिति—दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है यही इतिहास के साथ ईमानदारी है  क्या हिंदू विवाह व्यवस्था हमेशा से एकविवाही और तलाक-विहीन थी इस दावे में भी सावधानी आवश्यक है भारतीय इतिहास में विवाह की अनेक परंपराएं रही हैं। विभिन्न ग्रंथों और समुदायों में विवाह के अलग-अलग रूप मिलते हैं

आधुनिक भारत में हिंदू विवाह को कानून