कुत्ते की नस्ल और इंसान की जाति—दोनों को एक तराजू में तौलना तर्क नहीं

कुत्ते की नस्ल और इंसान की जाति—दोनों को एक तराजू में तौलना तर्क नहीं सोशल मीडिया पर वायरल व्यंग्य का जवाब तथ्यों, तर्क और संविधान की भावना से राष्ट्रीय अध्यक्ष हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा सोशल मीडिया पर एक व्यंग्यात्मक लेख सामने आता है, जिसमें कुत्तों की अलग-अलग नस्लों और मनुष्य की जाति-व्यवस्था के बीच तुलना करके यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि यदि कुत्तों की नस्ल के आधार पर उनमें अंतर किया जा सकता है, तो मनुष्यों में जाति के आधार पर अंतर को भी उसी प्रकार समझा जाना चाहिए व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन जब इसी व्यंग्य के माध्यम से इतिहास, संविधान और सामाजिक व्यवस्था पर निष्कर्ष निकाले जाने लगें, तब हंसी से आगे बढ़कर तर्क करना आवश्यक हो जाता है पहली बात—Breed और जाति एक ही चीज नहीं हैं कुत्तों की नस्ल का निर्धारण उनके वंशानुगत जैविक गुणों, प्रजनन और चयनित breeding के आधार पर होता है। अलग-अलग breeds में आकार, शारीरिक बनावट, गति, सूंघने की क्षमता, व्यवहार और अन्य गुणों में अंतर हो सकता है लेकिन मनुष्य की जाति कोई कुत्तों की breed नहीं है मनुष्य की सामाजिक पहचान को जन्म के आधार पर तय करके उसके अवसर, सम्मान, शिक्षा या पेशे को सीमित करना एक सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न है इसलिए German Shepherd और Labrador की तुलना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से करना वैज्ञानिक तुलना नहीं, बल्कि शब्दों का खेल है दूसरी बात—कुत्ते की कीमत और इंसान की कीमत में अंतर समझना होगा किसी व्यक्ति की कीमत उसकी जाति से नहीं होती लेकिन कुत्ते को खरीदने वाला व्यक्ति उसकी नस्ल, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य, उपयोगिता और अन्य विशेषताओं के आधार पर कीमत तय कर सकता है यहाँ मूल अंतर है कुत्ता बाजार में खरीदा-बेचा जाने वाला पशु है; मनुष्य संविधान द्वारा समान अधिकारों वाला नागरिक है किसी मनुष्य को उसकी जाति के कारण कमतर समझना गलत है, जबकि पशु की नस्ल के आधार पर उसकी विशेषताओं का वर्णन करना अपने आप में जातिगत भेदभाव नहीं कहलाता तीसरी बात—समानता का अर्थ समान गुण होना नहीं है यह व्यंग्य एक महत्वपूर्ण भ्रम पैदा करता है समानता का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति बिल्कुल समान होगा हर मनुष्य की शारीरिक क्षमता, प्रतिभा, रुचि, बुद्धि, शिक्षा, अनुभव और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं संवैधानिक समानता का अर्थ है कि व्यक्ति को कानून के सामने समानता, समान संरक्षण और सम्मान प्राप्त हो तथा केवल जन्म या सामाजिक पहचान के आधार पर उसके साथ अन्याय न किया जाए इसलिए अगर दो लोगों की क्षमताएं अलग हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उनके मानवीय अधिकार भी अलग हो जाने चाहिए यही बात उस पूरे व्यंग्य की सबसे बड़ी कमजोरी को सामने लाती है आरक्षण को कुत्तों की Breed से जोड़ना भी गलत तुलना है

व्यंग्य में कहा गया है कि यदि किसी कुत्ते को आरक्षण दे दिया जाए तो वह दूसरी नस्ल का कुत्ता बन जाएगा यह बात हास्य पैदा कर सकती है, लेकिन सामाजिक न्याय की अवधारणा को समझाती नहीं है आरक्षण का उद्देश्य किसी व्यक्ति की जैविक नस्ल बदलना नहीं है आरक्षण और अन्य सकारात्मक नीतियों का संबंध सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन, प्रतिनिधित्व और अवसरों की असमानता जैसे मानवीय-सामाजिक प्रश्नों से है कुत्ते को आरक्षण देने से उसकी breed नहीं बदलती—यह बात सही है लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि मानव समाज में ऐतिहासिक या सामाजिक असमानता जैसी कोई समस्या ही नहीं है, तार्किक रूप से गलत है सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—क्या जातिगत भेदभाव का विरोध होना चाहिए? बिल्कुल होना चाहिए किसी व्यक्ति के साथ केवल उसकी जाति के कारण अपमान, छुआछूत, हिंसा, अवसरों से वंचित करना या सामाजिक बहिष्कार करना गलत है लेकिन जातिगत भेदभाव का विरोध करने के लिए हमें किसी दूसरे वर्ग का अपमान करने की आवश्यकता नहीं है और इसी प्रकार किसी ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा करते समय भी पूरे समुदाय को अपराधी या शोषक घोषित करना उचित नहीं है इतिहास को समझने के लिए भावनाओं के बजाय दस्तावेज, सामाजिक परिस्थितियां, कानून, साहित्य और विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है मनुस्मृति के नाम पर भी अधूरी बहस नहीं होनी चाहिए

आजकल सोशल मीडिया पर किसी भी जातिगत चर्चा में तुरंत “मनुवाद” और “मनुस्मृति” शब्द जोड़ दिया जाता है

यह विषय इतना सरल नहीं है कि कुछ पंक्तियां उठाकर हजारों वर्षों के पूरे भारतीय समाज का अंतिम निष्कर्ष निकाल दिया जाए।

धर्मशास्त्र, स्मृति-ग्रंथ, सामाजिक व्यवहार और आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था—इन सभी को अलग-अलग समझना चाहिए।

आज भारत का शासन भारतीय संविधान से चलता है, किसी प्राचीन सामाजिक ग्रंथ से नहीं।

इसलिए आज के नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों का आधार संविधान और कानून हैं।

व्यंग्य की एक बात सही है—लेकिन उसका निष्कर्ष गलत है

व्यंग्य हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर सकता है कि:

क्या केवल जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को श्रेष्ठ या निम्न समझना उचित है?

इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

लेकिन उसी के साथ दूसरा प्रश्न भी पूछना चाहिए—

> क्या किसी सामाजिक व्यवस्था की आलोचना करने के लिए करोड़ों लोगों को एक ही मानसिकता वाला बताना उचित है?

इसका उत्तर भी है—नहीं।

किसी व्यक्ति की जाति देखकर उसके चरित्र का फैसला करना गलत है।

उसी प्रकार किसी व्यक्ति के नाम, धर्म या सामाजिक पहचान देखकर उसे अपराधी या शोषक मान लेना भी गलत है।

में कैसी बहस चाहिए?

हमें ऐसी बहस नहीं चाहिए जिसमें—

“तुम मनुवादी हो।”

“तुम जातिवादी हो।”

“तुम्हारे पूर्वजों ने ऐसा किया।”

“तुम्हारा पूरा समाज ऐसा है।”

जैसे आरोप लगाकर संवाद समाप्त कर दिया जाए।

हमें पूछना चाहिए—

भेदभाव हुआ तो उसके प्रमाण क्या हैं?

किस कालखंड की बात हो रही है?

कौन-सा ऐतिहास