खखरेरू, फतेहपुर थाना क्षेत्र के सुदेशरा गांव में खेत की सुरक्षा के लिए लगाए गए करंटयुक्त तार की चपेट में आने से एक वृद्ध और उसकी बकरी की मौत हो गई। घटना से गांव में शोक की लहर दौड़ गई। सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जांच शुरू कर दी है।
जानकारी के अनुसार सुदेशरा गांव निवासी इद्दू पुत्र दरगाही (70) शुक्रवार शाम करीब छह बजे बकरी चराकर घर लौट रहे थे। रास्ते में सड़क किनारे स्थित एक खेत के चारों ओर किसान धर्म सिंह पुत्र राधे द्वारा झटका तार बांधा गया था, जिसमें परिजनों के अनुसार कथित रूप से 440 वोल्ट विद्युत करंट प्रवाहित किया जा रहा था। इसी दौरान घास चरते समय बकरी तार की चपेट में आकर फंस गई।
बताया जाता है कि बकरी को बचाने के प्रयास में इद्दू ने जैसे ही तार को छुआ, वह भी करंट की चपेट में आ गए। तेज करंट लगने से उनकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि बकरी ने भी दम तोड़ दिया।
घटना की सूचना मिलते ही परिजन और ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। वृद्ध की मौत की खबर से परिवार में कोहराम मच गया। मृतक की पत्नी समेत पुत्रियां रिहाना बानो, बेबी, कमरजहां, फूलजहां और रुखसाना बानो का रो-रोकर बुरा हाल है। वहीं, मृतक का पुत्र इम्तियाज अहमद रोजी-रोटी के सिलसिले में मुंबई में रहता है। ग्रामीणों के अनुसार इद्दू बकरियां चराकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।
सूचना मिलने पर खखरेरू थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण कर आवश्यक साक्ष्य भी जुटाए।
मृतक के परिजनों ने पुलिस को तहरीर देकर आरोप लगाया है कि खेत की सुरक्षा के नाम पर खुलेआम करंट प्रवाहित करना घोर लापरवाही है। उन्होंने संबंधित किसान के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर कड़ी कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
थाना प्रभारी सत्यपाल सिंह ने बताया कि मामले से संबंधित तहरीर प्राप्त हुई है तहरीर के आधार पर जांच कर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।आज का मनुष्य ज्ञान के ऐसे युग में जी रहा है जहाँ सूचना (Information) की कोई कमी नहीं है। विज्ञान, तकनीक, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र और संसार के अनगिनत विषयों पर वह घंटों चर्चा कर सकता है। वह दूसरों के जीवन का विश्लेषण करने में दक्ष हो गया है, दूसरों की कमियाँ गिनाने में निपुण हो गया है, दूसरों के चरित्र का मूल्यांकन करने में स्वयं को योग्य समझने लगा है। परंतु जब प्रश्न स्वयं के भीतर झाँकने का आता है, तब अधिकांश लोग मौन हो जाते हैं। यही मानव जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
इसी सत्य को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है—
"यदि हमें सबके बारे में पता है, तो मान लेना चाहिए कि अभी कुछ भी नहीं पता। लेकिन यदि हमें अपने बारे में पता है, तो समझिए सब कुछ जान लिया। यही उत्तम है, यही आवश्यक है।"
यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय अध्यात्म, वेदांत और जीवन-दर्शन का सार है।
स्वयं को जानना ही वास्तविक ज्ञान है
मनुष्य का जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों का नाम नहीं है। पद, प्रतिष्ठा, धन, सम्मान और प्रसिद्धि जीवन को सुविधा तो दे सकते हैं, परंतु शांति नहीं दे सकते। वास्तविक शांति तब प्राप्त होती है जब मनुष्य स्वयं को पहचान लेता है।
उपनिषदों का उद्घोष है— "आत्मानं विद्धि" अर्थात् स्वयं को जानो।
जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है, तभी उसके जीवन में परिवर्तन प्रारम्भ होता है। वह समझने लगता है कि मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ, न केवल नाम हूँ, न पद हूँ, न धन हूँ और न ही सामाजिक पहचान हूँ। इन सबसे परे मेरा वास्तविक अस्तित्व चेतना है, आत्मा है, जो परमात्मा का अंश है।
दूसरों को जानने की सीमा
संसार में हम जितना अधिक दूसरों के जीवन में उलझते हैं, उतना ही स्वयं से दूर होते जाते हैं। हम यह जानने का प्रयास करते रहते हैं कि कौन क्या कर रहा है, कौन सही है, कौन गलत है, किसके पास कितना धन है, किसे कितना सम्मान मिला, किसने क्या कहा।
परंतु यह सब जान लेने के बाद भी मनुष्य का अंतर्मन अशांत रहता है।
क्यों?
क्योंकि बाहरी ज्ञान केवल बुद्धि को भरता है, जबकि आत्मज्ञान आत्मा को प्रकाशित करता है। दूसरों के दोष जानने से हमारा जीवन श्रेष्ठ नहीं बनता, परंतु अपने दोष पहचान लेने से जीवन का संपूर्ण मार्ग बदल सकता है।
आत्मचिंतन ही आत्मविकास का आधार
जिस दिन मनुष्य प्रतिदिन कुछ समय स्वयं से प्रश्न पूछना प्रारम्भ कर देता है—
- मैं कौन हूँ?
- मेरा जीवन किस उद्देश्य के लिए है?
- मेरे भीतर कौन-कौन सी कमजोरियाँ हैं?
- मैं किन गुणों को विकसित कर सकता हूँ?
- क्या मेरे कर्म मानवता और राष्ट्रहित में हैं?
उसी दिन से उसके जीवन का वास्तविक विकास प्रारम्भ हो जाता है।
आत्मचिंतन मनुष्य को विनम्र बनाता है। उसे अपने अहंकार का बोध होता है। वह दूसरों को दोष देने के स्थान पर स्वयं को सुधारने का प्रयास करता है। आत्मज्ञान से समाप्त होता है अहंकार
अहंकार तब तक रहता है जब तक मनुष्य स्वयं को केवल शरीर और पद समझता है। जैसे ही आत्मज्ञान का प्रकाश भीतर प्रवेश करता है, मनुष्य समझ जाता है कि पद अस्थायी है, धन अस्थायी है, यश अस्थायी है, शरीर भी एक दिन नष्ट हो जाएगा; परंतु आत्मा शाश्वत है।
यही अनुभूति उसे विनम्र, सहनशील, करुणामय और सेवा-भाव से परिपूर्ण बना देती है। स्वयं को जानने वाला सभी में ईश्वर को देखता है
जब मनुष्य अपने भीतर स्थित चेतना का अनुभव करता है, तब वह दूसरों में भी उसी चेतना का दर्शन करने लगता है।
फिर उसके लिए जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे भेद गौण हो जाते हैं।
उसके भीतर यह भावना जागृत होती है कि—
"संपूर्ण मानवता एक परिवार है।"
यही भारतीय संस्कृति का महान संदेश "वसुधैव कुटुम्बकम्" है।
ऐसा व्यक्ति किसी से घृणा नहीं करता, किसी का अहित नहीं चाहता और प्रत्येक प्राणी के कल्याण की भावना रखता है।
स्वयं को जीतना सबसे बड़ी विजय
इतिहास में अनेक विजेताओं ने देशों को जीता, साम्राज्य स्थापित किए, अपार धन अर्जित किया; परंतु जो स्वयं के मन, इंद्रियों, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक विजेता कहलाता है।
भगवद्गीता का संदेश भी यही है कि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका अपना मन है और सबसे बड़ा शत्रु भी वही मन है।
इसलिए संसार को बदलने से पहले स्वयं को बदलना आवश्यक है।
ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य
ज्ञान केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने या सम्मान प्राप्त करने का माध्यम नहीं होना चाहिए। ज्ञान का उद्देश्य है—
- जीवन में विवेक उत्पन्न करना,
- चरित्र का निर्माण करना,
- मानवता की सेवा करना,
- राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाना,
- और अंततः आत्मा तथा परमात्मा के संबंध का अनुभव करना।
जब ज्ञान इन उद्देश्यों की पूर्ति करता है, तभी वह सार्थक कहलाता है।
वर्तमान समय में आत्मज्ञान की आवश्यकता
आज का समाज तनाव, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, अविश्वास और मानसिक अशांति से जूझ रहा है। आधुनिक सुविधाएँ बढ़ी हैं, परंतु मन की शांति घटती जा रही है।
ऐसे समय में आत्मज्ञान केवल आध्यात्मिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन गया है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को समझने का प्रयास करे, अपने दोषों को सुधारे, अपने भीतर प्रेम, सेवा, संयम, करुणा और सत्य का विकास करे, तो परिवार सुधरेगा, समाज सुधरेगा, राष्ट्र सुदृढ़ होगा और विश्व में शांति स्थापित होगी।
निष्कर्ष
मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहरी संसार को जीतना नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन को प्रकाशित करना है।
जो स्वयं को जान लेता है, वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलित, विनम्र, सफल और शांत बन जाता है। उसके लिए ज्ञान केवल सूचना नहीं रहता, बल्कि अनुभव बन जाता है। वही अनुभव उसे मानवता की सेवा, राष्ट्र निर्माण और विश्व कल्याण की दिशा में प्रेरित करता है।
अतः प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण और आत्मसाधना के लिए अवश्य निकालना चाहिए, क्योंकि—
"जो स्वयं को जान लेता है, वह समस्त सृष्टि को जानने की दिशा में प्रवेश कर जाता है; और जो स्वयं को भूल जाता है, उसके लिए समस्त संसार का ज्ञान भी अधूरा रह जाता है।"