सिकुड़ना नहीं, अपनी सभ्यता को पहचानना होगा

“हिंदू साम्राज्य” की महत्वाकांक्षा का अर्थ आज किसी भूभाग पर कब्जा नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, ज्ञान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का पुनर्जागरण होना चाहिए

राष्ट्रीय अध्यक्ष हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला

राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा

भारत के इतिहास को पढ़ते समय एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी आक्रमण थे, या समय के साथ अपने ही इतिहास और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से दूर होते जाना आज जब कोई कहता है कि “हमें हिंदू साम्राज्य की महत्वाकांक्षा जगानी है, फिर तक्षशिला और गांधार हमारे होंगे”, तो इस विचार को केवल भूगोल और विजय की भाषा में सम झना उचित नहीं होगा आज के लोकतांत्रिक भारत में किसी दूसरे देश की भूमि पर अधिकार करने की महत्वाकांक्षा न संविधानसम्मत है और न ही व्यावहारिक समाधान लेकिन यदि “हिंदू साम्राज्य” से आशय ज्ञान, संस्कृति, चरित्र, संगठन, आत्मविश्वास और सभ्यतागत चेतना के विस्तार से है, तो यह विचार गंभीर विमर्श का विषय अवश्य बन सकता है तक्षशिला केवल एक स्थान नहीं, ज्ञान की स्मृति है तक्षशिला का नाम आते ही हमारे सामने प्राचीन भारत की वह बौद्धिक परंपरा दिखाई देती है, जिसने शिक्षा और ज्ञान को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया तक्षशिला आज भारत की राजनीतिक सीमा के बाहर पाकिस्तान में स्थित है। इसलिए उसे आज के अर्थ में “वापस लेना” कोई साधारण राजनीतिक नारा नहीं है लेकिन क्या तक्षशिला की ज्ञान-परंपरा को वापस लाना असंभव हैबिल्कुल नहीं हम तक्षशिला को अपने इतिहास में वापस ला सकते हैंअपने पाठ्यक्रम में वापस ला सकते है अपने शोध में वापस ला सकते हैं अपने युवाओं की चेतना में वापस ला सकते हैं इसी प्रकार गांधार केवल एक भूभाग का नाम नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है सीमाएं बदलना आसान नहीं, सभ्यता की शक्ति बढ़ाना संभव है हमें यह अंतर समझना होगा भूगोल पर अधिकार और संस्कृति का प्रभाव—दो अलग बातें हैं आज का भारत संप्रभु राष्ट्रों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की दुनिया में जीता है। इसलिए किसी पड़ोसी देश की भूमि को अपना घोषित करना समाधान नहीं है लेकिन यदि भारत इतना शक्तिशाली बने कि भारतीय ज्ञान की दुनिया में प्रतिष्ठा बढ़े, भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक केंद्र बनें, संस्कृत और भारतीय भाषाओं पर शोध बढ़े, योग और आयुर्वेद का वैज्ञानिक अध्ययन आगे बढ़े भारतीय कला और दर्शन विश्वभर में पढ़े जाएं, और दुनिया भारत की सभ्यता को सम्मान के साथ समझे तो यह किसी भी अर्थ में छोटी उपलब्धि नहीं होगी यही आधुनिक सभ्यतागत आत्मविश्वास है हिंदू समाज को “हीनभावना” से बाहर निकलना होगा सदियों के संघर्ष, राजनीतिक परिवर्तन और औपनिवेशिक इतिहास के बाद किसी भी समाज में आत्महीनता पैदा हो सकती है इसलिए आज आवश्यकता है कि युवा अपने इतिहास को केवल गौरव-कथाओं के रूप में नहीं, बल्कि अध्ययन और प्रमाण के साथ समझें हमारे पूर्वजों ने क्या उपलब्धियां हासिल कीं कहां हम आगे थे कहां हम कमजोर पड़े हमने क्या खोया और आज हम क्या बना सकते हैं इन सभी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार होना चाहिएइतिहास का उद्देश्य केवल अतीत पर गर्व करना नहीं, वर्तमान को बेहतर बनाना भी है साम्राज्य की नई परिभाषा क्या हो आज के युग में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य वह नहीं जिसके पास सबसे अधिक भूमि हो सबसे शक्तिशाली वह है जिसक ज्ञान-व्यवस्था मजबूत हो, अर्थव्यवस्था मजबूत हो, युवा शिक्षित हों, विज्ञान उन्नत हो,संस्कृति जीवंत हो,

न्याय-व्यवस्था मजबूत हो, और समाज संगठित हो यदि भारत विश्व के ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और नैतिक नेतृत्व में अग्रणी बनता है, तो यह किसी भी भूभाग को जीतने से कहीं अधिक स्थायी विजय होगी तक्षशिला और गांधार को कैसे “वापस” लाया जा सकता है ज्ञान में तक्षशिला की शिक्षा-परंपरा को आधुनिक विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में जीवित करके संस्कृति में गांधार की कला और भारतीय सभ्यतागत इतिहास का व्यापक अध्ययन करके इतिहास में नई पीढ़ी को प्रमाणित इतिहास पढ़ाकर साहित्य में भारतीय भाषाओं में शोध, पुस्तकें और विश्वस्तरीय साहित्य तैयार करके कूटनीति में पड़ोसी देशों के साथ सम्मानजनक और शांतिपूर्ण संबंधों के माध्यम से शक्ति में।

आर्थिक, वैज्ञानिक, सैन्य और तकनीकी रूप से भारत को मजबूत बनाकर विजय का सबसे बड़ा रूप क्या है किसी भूमि पर झंडा लगा देना विजय का एक रूप हो सकता है लेकिन किसी सभ्यता के विचारों को दुनिया स्वीकार करे—यह उससे कहीं बड़ी विजय है यदि दुनिया तक्षशिला को भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा के संदर्भ में पढ़ती है,

यदि गांधार की कला को भारतीय सभ्यता के व्यापक इतिहास में समझा जाता है,

यदि भारतीय दर्शन विश्व के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है,

यदि भारतीय युवा अपनी विरासत पर गर्व करने के साथ आधुनिक विज्ञान में भी विश्व का नेतृत्व करता है—

तो समझिए कि सभ्यतागत आत्मविश्वास जाग चुका है।

हिंदू होना केवल अतीत का गौरव नहीं, भविष्य की जिम्मेदारी भी है

हमें यह तय करना होगा कि हम अपने पूर्वजों की उपलब्धियों को केवल सोशल मीडिया पोस्ट में याद करेंगे या उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाएंगे।

यदि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान दिया—हम ज्ञान की नई ऊंचाइयां बनाएं।

यदि उन्होंने दर्शन दिया—हम शोध करें।

यदि उन्होंने कला दी—हम उसका संरक्षण करें।

यदि उन्होंने शिक्षा की परंपरा दी—हम विश्वस्तरीय संस्थान बनाएं।

यदि उन्होंने समाज को जोड़ने का संदेश दिया—हम अपने समाज में संगठन और सद्भाव बढ़ाएं।

यही सच्चा पुनर्जा

नफरत नहीं, आत्मविश्वास चाहिए

अपने इतिहास पर गर्व करने के लिए किसी दूसरे धर्म या देश से घृणा करना आवश्यक नहीं