हिन्दू समाज जागे, संगठित हो और धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़ा हो
धर्मरक्षा का अर्थ किसी के प्रति घृणा नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति, आस्था और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है
✍️ हिंदू देव प्रकाश शुक्ला
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा
फ्रांसीसी पत्रकार फ्रांस्वा गॉटियर द्वारा हिन्दू समाज के संबंध में व्यक्त किए गए विचार केवल एक विदेशी पत्रकार की टिप्पणी भर नहीं हैं, बल्कि वे हिन्दू समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं प्रश्न यह है कि आखिर हजारों वर्षों पुरानी, विश्व की महानतम सभ्यताओं में से एक हिन्दू सभ्यता का समाज अपनी शक्ति को पहचानने में इतना संकोच क्यों करता है हिन्दू भारत में बहुसंख्यक हैं, लेकिन क्या केवल संख्या किसी समाज को शक्तिशाली बना देती है नहीं संख्या शक्ति तब बनती है, जब उसके साथ आत्मविश्वास, संगठन, शिक्षा, चरित्र, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र के प्रति समर्पण जुड़ा हो आज हिन्दू समाज को सबसे अधिक आवश्यकता अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की नहीं, बल्कि अपनी शक्ति को पहचानने की है।
न्दू समाज को भय नहीं, आत्मविश्वास की आवश्यकता है
हिन्दू समाज सदियों से सहिष्णु रहा है।
उसने विभिन्न विचारों को स्थान दिया।
उसने अनेक उपासना पद्धतियों को स्वीकार किया।
उसने दुनिया को यह संदेश दिया कि सत्य तक पहुंचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं।
लेकिन आज आवश्यकता है कि हिन्दू समाज यह समझे कि—
सहिष्णु अच्छी बात है, लेकिन अपनी पहचान के प्रति उदासीनता अच्छी बात नहीं है।
क्षमा महान गुण है, लेकिन अन्याय के सामने हमेशा मौन रहना महानता नहीं है।
शांति आवश्यक है, लेकिन अपनी संस्कृति और अधिकारों के प्रति निष्क्रियता भविष्य के लिए खतरा बन सकती है।
हिन्दू समाज को किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन उसे अपने धर्म, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जागरूक अवश्य होना चाहिए।
धर्मरक्षा का अर्थ हिंसा नहीं है
आज कुछ लोग जानबूझकर धर्मरक्षा और कट्टरता को एक समान बताने का प्रयास करते हैं।
यह भ्रम दूर होना चाहिए।
धर्मरक्षा का अर्थ किसी दूसरे धर्म को नुकसान पहुंचाना नहीं है।
धर्मरक्षा का अर्थ किसी निर्दोष व्यक्ति के प्रति हिंसा करना नहीं है।
धर्मरक्षा का अर्थ कानून को अपने हाथ में लेना नहीं है।
धर्मरक्षा का वास्तविक अर्थ है—
अपने धर्म को जानना।
अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ना।
अपने तीर्थों, मंदिरों और धार्मिक विरासत की रक्षा करना।
अपने इतिहास को सही रूप में समझना।
अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहना।
धर्म के विरुद्ध फैलाए जा रहे भ्रम का तर्क और सत्य के माध्यम से उत्तर देना।
यही वास्तविक धर्मरक्षा है।
और यही सनातन धर्म की शक्ति है।
भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने हमें क्या सिखाया?
सनातन परंपरा कायरता की शिक्षा नहीं देती।
भगवान श्रीराम मर्यादा के प्रतीक हैं, लेकिन जब अधर्म और अन्याय सामने आया, तो उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
भगवान श्रीकृष्ण करुणा और ज्ञान के प्रतीक हैं, लेकिन उन्होंने अर्जुन को यह भी समझाया कि अन्याय के सामने अपने कर्तव्य से भागना उचित नहीं है।
इसलिए धर्म का संदेश स्पष्ट है—
अन्याय मत करो, लेकिन अन्याय को स्वीकार भी मत करो।
किसी पर अत्याचार मत करो, लेकिन अत्याचार के सामने कायर बनकर मत खड़े रहो।
शांति का समर्थन करो, लेकिन राष्ट्र और धर्म की गरिमा से समझौता मत करो।
यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
इतिहास से घृणा नहीं, सबक लेना होगा
भारत का इतिहास गौरवशाली है।
लेकिन इतिहास केवल गौरवगान के लिए नहीं पढ़ा जाता।
इतिहास से भविष्य की दिशा भी तय होती है।
हमारे पूर्वजों ने क्या संघर्ष किए?
भारत की सभ्यता किन परिस्थितियों से गुजरी?
हमारी सांस्कृतिक विरासत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
इन प्रश्नों को जानना आवश्यक है।
लेकिन इतिहास पढ़ने का उद्देश्य किसी के प्रति घृणा फैलाना नहीं होना चाहिए।
हमारा उद्देश्य होना चाहिए—
इतिहास से सीखो, गलतियों को समझो और भविष्य को मजबूत बनाओ।
जो समाज इतिहास भूल जाता है, वह भविष्य के लिए तैयार नहीं रह पाता।
इसलिए हिन्दू युवाओं को भारत के इतिहास, दर्शन और संस्कृति का गंभीर अध्ययन करना चाहिए।
हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी—आपसी विभाजन
यदि हिन्दू समाज के सामने कोई सबसे बड़ी चुनौती है, तो वह केवल बाहर से आने वाली चुनौतियां नहीं हैं।
सबसे बड़ी चुनौती हमारे भीतर के विभाजन भी हैं।
जाति के नाम पर विभाजन।
ऊंच-नीच के नाम पर विभाजन।
क्षेत्र के नाम पर विभाजन।
भाषा के नाम पर विभाजन।
राजनीतिक विचारों के नाम पर विभाजन।
जब तक हिन्दू समाज अपने ही लोगों को बराबरी और सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा, तब तक उसकी एकता अधूरी रहेगी।
आज आवश्यकता है कि हम सबसे पहले अपने समाज के भीतर सामाजिक समरसता स्थापित करें।
जिस हिन्दू समाज में गरीब भूखा है, उसे पहले भोजन चाहिए।
जिस परिवार का बच्चा शिक्षा से वंचित है, उसे शिक्षा चाहिए।
जिस समाज की बेटी असुरक्षित है, उसे सुरक्षा और सम्मान चाहिए।
जिस युवा के पास रोजगार नहीं है, उसे अवसर चाहिए।
धर्मरक्षा का अर्थ केवल नारे नहीं, समाज सेवा भी है।
धर्मांतरण के प्रश्न पर गंभीरता और कानूनसम्मत दृष्टिकोण आवश्यक
भारत में धर्मांतरण का विषय गंभीर सामाजिक विमर्श का विषय है।
हर व्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति को भय, धोखे, दबाव या अनुचित प्रलोभन के माध्यम से प्रभावित किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और कानूनसम्मत जांच होनी चाहिए।
हिन्दू समाज को इस चुनौती का उत्तर किसी समुदाय के प्रति घृणा से नहीं देना है।
हमारा उत्तर होना चाहिए—
सेवा।
शिक्षा।
सामाजिक सहयोग।
गरीबों क