सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि मानव जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को छह प्रमुख शत्रु या षड्रिपु कहा गया है। सामान्यतः इन्हें आध्यात्मिक प्रगति में बाधक माना जाता है, क्योंकि ये मनुष्य को सांसारिक बंधनों में जकड़कर रखते हैं। किंतु भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस का दृष्टिकोण अत्यंत अनूठा और प्रेरणादायक था। उनका कहना था कि इन प्रवृत्तियों को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इन्हें सही दिशा देकर ईश्वर-प्राप्ति का साधन बनाया जा सकता है। सबसे पहले काम अर्थात तीव्र इच्छा की बात करें। सामान्यतः मनुष्य सांसारिक सुखों और भोग-विलास की कामना करता है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि यदि यही तीव्र इच्छा ईश्वर के दर्शन और आत्मिक उन्नति की लालसा में बदल जाए, तो वह साधना की सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। जिस प्रकार संसार के लिए व्यक्ति व्याकुल होता है, उसी प्रकार यदि वह परमात्मा के लिए व्याकुल हो जाए, तो आध्यात्मिक सफलता निश्चित है।
क्रोध को भी सामान्यतः नकारात्मक माना जाता है, किंतु इसे भी सकारात्मक दिशा दी जा सकती है। श्रीरामकृष्ण का संदेश था कि मनुष्य को अपने आलस्य, अज्ञान और आध्यात्मिक दुर्बलताओं के विरुद्ध क्रोध करना चाहिए। यह दृढ़ संकल्प कि “मैं ईश्वर का भक्त हूँ, मुझे आध्यात्मिक लक्ष्य अवश्य प्राप्त करना है”, साधना में शक्ति प्रदान करता है।
इसी प्रकार लोभ को भी ईश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। संसार की वस्तुओं, धन और पद के प्रति लोभ रखने के स्थान पर यदि व्यक्ति ईश्वर के प्रेम, भक्ति और ज्ञान को प्राप्त करने का लोभ करे, तो वही लोभ आध्यात्मिक उन्नति का कारण बन जाता है। ऐसा लोभ मनुष्य को निरंतर साधना और आत्म-विकास की ओर प्रेरित करता है।
मोह का अर्थ है आसक्ति। सामान्यतः मनुष्य परिवार, धन और भौतिक वस्तुओं में आसक्त रहता है। श्रीरामकृष्ण का उपदेश था कि इस मोह को ईश्वर के प्रति अनुराग में परिवर्तित किया जाए। जब मन परमात्मा के प्रेम में बंध जाता है, तब सांसारिक मोह स्वतः कम होने लगता है और जीवन में शांति तथा संतोष का उदय होता है।
मद या अहंकार भी यदि गलत दिशा में हो तो पतन का कारण बनता है। परंतु श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को यह गौरव अवश्य होना चाहिए कि वह ईश्वर की संतान है। यह सकारात्मक आत्मसम्मान व्यक्ति को हीनभावना और दुर्बलताओं से बचाता है तथा उसके भीतर आत्मविश्वास का संचार करता है। अंत में मत्सर अर्थात ईर्ष्या की बात आती है। सामान्यतः दूसरों की सफलता देखकर ईर्ष्या उत्पन्न होती है। श्रीरामकृष्ण का संदेश है कि यदि किसी साधक ने आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की है, तो उसकी सफलता से प्रेरणा लेनी चाहिए। यह भावना कि “यदि वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, तो मैं भी कर सकता हूँ”, साधक को आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि श्रीरामकृष्ण परमहंस का संदेश यह है कि मनुष्य की प्रत्येक शक्ति मूल्यवान है। आवश्यकता केवल उसकी दिशा बदलने की है। जब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसी प्रवृत्तियाँ ईश्वर-केंद्रित हो जाती हैं, तब वे बंधन नहीं रह जातीं, बल्कि मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग बन जाती हैं। यही शिक्षा हमें सिखाती है कि जीवन की नकारात्मक प्रतीत होने वाली शक्तियाँ भी सही मार्गदर्शन से आध्यात्मिक उत्कर्ष का साधन बन सकती हैं।