चुनाव, संवैधानिक व्यवस्था, सत्ता परिवर्तन और भारत की संप्रभुता पर एक विस्तृत वैचारिक वक्तव्य
विचार एवं वक्तव्यकर्ता: हिन्दू देव प्रकाश शुक्ला जी
राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय युवा वाहिनी
राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा
प्रस्तावना: लोकतंत्र में सत्ता का स्वामी कौन है—जनता या कोई विशेष वर्ग?
भारत का लोकतंत्र किसी व्यक्ति, परिवार, संगठन, विचारधारा, उद्योगपति, बुद्धिजीवी अथवा राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। भारत का लोकतंत्र भारत की जनता की सामूहिक आकांक्षाओं, संवैधानिक अधिकारों और नागरिकों की स्वतंत्र राजनीतिक पसंद पर आधारित है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ सत्ता किसी के जन्मसिद्ध अधिकार से नहीं मिलती। सत्ता जनता के विश्वास, चुनावी समर्थन और संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से प्राप्त होती है। जनता किसी सरकार को चुन सकती है, उससे सवाल पूछ सकती है, उसके निर्णयों का समर्थन कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उसे सत्ता से बाहर भी कर सकती है।
इसीलिए लोकतंत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन सत्ता में है, बल्कि यह है कि सत्ता किस प्रक्रिया से प्राप्त हुई है, उसका उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है और क्या वह जनता के प्रति जवाबदेह है?
आज देश में चुनाव, निर्वाचन आयोग, राजनीतिक विरोध, सरकार की आलोचना और सत्ता परिवर्तन को लेकर अनेक प्रकार के विचार सामने आते हैं। इन विचारों का मूल्यांकन भावनाओं या आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान, तथ्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए।
मेरा स्पष्ट मत है कि भारत में सत्ता परिवर्तन का अधिकार जनता के पास है, किसी कथित अभिजात वर्ग के पास नहीं। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ यह भी है कि सत्ता में बैठे लोगों से प्रश्न पूछने, चुनावी प्रक्रिया की समीक्षा करने और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त रहे।
यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
1. रेजीम चेंज का अर्थ क्या है?
राजनीतिक विमर्श में ‘रेजीम चेंज’ अर्थात सत्ता-व्यवस्था या शासन में परिवर्तन शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग अर्थों में किया जाता है।
कभी इसका अर्थ किसी सरकार को चुनाव के माध्यम से बदलना होता है। कभी इसका अर्थ नीतियों में बदलाव से होता है और कभी इसका आशय मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन से लगाया जाता है।
इन तीनों बातों में अंतर समझना आवश्यक है।
यदि कोई राजनीतिक दल वर्तमान सरकार को हटाकर स्वयं सत्ता में आना चाहता है, तो वह लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। उसे जनता के बीच जाना चाहिए, अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करना चाहिए, जनता का विश्वास अर्जित करना चाहिए और चुनाव जीतने का प्रयास करना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति या संगठन मौजूदा नीतियों से असहमत है, तो उसे शांतिपूर्ण विरोध, जनजागरण, जनसभाओं, न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखने का अधिकार है।
लेकिन यदि कोई व्यक्ति सत्ता परिवर्तन के नाम पर हिंसा, गैरकानूनी तरीके या जनता के मताधिकार को निष्प्रभावी करने की वकालत करता है, तो उस विचार का विरोध किया जाना चाहिए।
यहाँ एक बात स्पष्ट है—केवल ‘रेजीम चेंज’ शब्द का इस्तेमाल कर देने से किसी व्यक्ति की मंशा सिद्ध नहीं हो जाती। उसके पूरे वक्तव्य, संदर्भ और वास्तविक कार्यों को देखना आवश्यक है।
यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति ने वास्तव में कहा है कि वह सत्ता परिवर्तन करके ही दम लेगा, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि वह किस प्रकार का परिवर्तन चाहता है, उसका संवैधानिक आधार क्या है और वह परिवर्तन किस प्रक्रिया से करना चाहता है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना भी अधिकार है और सवालों का जवाब माँगना भी नागरिक का अधिकार है।
2. जनता का जनादेश सर्वोपरि है, लेकिन जनादेश स्थायी अनुमति-पत्र नहीं है
भारत की जनता जब किसी दल या गठबंधन को चुनाव में बहुमत देती है, तो वह उसे सरकार चलाने का अवसर देती है। उस जनादेश का सम्मान करना लोकतांत्रिक मर्यादा है।
किसी सरकार को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसकी विचारधारा किसी विशेष बुद्धिजीवी, राजनीतिक कार्यकर्ता या प्रभावशाली वर्ग को पसंद नहीं है।
यदि किसी दल को जनता का समर्थन प्राप्त है, तो उसके राजनीतिक विरोधियों को भी जनता के सामने अपना विकल्प प्रस्तुत करना चाहिए। उन्हें अपने विचारों, नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से मतदाताओं का विश्वास जीतना चाहिए।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा पक्ष भी समझना होगा।
जनता का जनादेश किसी सरकार को संविधान से ऊपर नहीं रखता। सरकार का बहुमत उसे कानून से परे जाने का अधिकार नहीं देता। चुनाव जीतना शासन करने का अधिकार है, नागरिकों के अधिकारों को समाप्त करने का लाइसेंस नहीं।
इसीलिए लोकतंत्र में दो बातें एक साथ सत्य हैं:
- जनता द्वारा चुनी गई सरकार के जनादेश का सम्मान होना चाहिए।
- सरकार की नीतियों, निर्णयों और संस्थागत कार्यप्रणाली की आलोचना तथा समीक्षा भी होनी चाहिए।
भारत का संविधान सरकार और विपक्ष, दोनों के अधिकारों तथा सीमाओं को निर्धारित करता है।
यदि हम केवल जनादेश की बात करें और जवाबदेही को भूल जाएँ, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। और यदि हम जनता के जनादेश को स्वीकार ही न करें, तो भी लोकतंत्र कमजोर होगा।
अतः सही रास्ता है—जनादेश का सम्मान, संवैधानिक मर्यादा का पालन और जनता के प्रति निरंतर जवाबदेही।
3. क्या चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतंत्र के विरुद्ध है?
यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि कोई व्यक्ति चुनाव आयोग, मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया, मतगणना या चुनावी नियमों पर प्रश्न उठाता है, तो केवल इसी आधार पर उसे लोकतंत्र का विरोधी नहीं कहा जा सकता।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 निर्व