धर्म केवल उत्सव मनाने का नाम नहीं, बल्कि अपनी आस्था, संस्कार, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को सम्मानपूर्वक जीने का नाम है।”
विचार एवं वक्तव्यकर्ता: हिंदू देव प्रकाश शुक्ला जी
राष्ट्रीय अध्यक्ष — राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा
प्रस्तावना: क्या हम अपनी आस्था का वास्तविक अर्थ भूलते जा रहे हैं?
आज हमारे सामने एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है—क्या हम अपने धार्मिक त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों को श्रद्धा, भक्ति एवं सांस्कृतिक गौरव के साथ मना रहे हैं, या धीरे-धीरे उन्हें केवल मनोरंजन, दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनाते जा रहे हैं?
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, परिवार या आयोजन तक सीमित नहीं है। यह हमारी सामाजिक चेतना, धार्मिक मर्यादा और आने वाली पीढ़ियों को दिए जाने वाले संस्कारों से जुड़ा हुआ विषय है।
जब नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना होती है, गणेशोत्सव में भगवान गणेश की पूजा होती है, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है और विवाह जैसे पवित्र संस्कार संपन्न होते हैं, तब इन आयोजनों में भक्ति, आनंद, उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा का सुंदर समन्वय होना चाहिए।
लेकिन जब कहीं धार्मिक आयोजन नशे, अश्लील गीतों, अभद्र व्यवहार, अनावश्यक शोर और दिखावे की प्रतियोगिता में बदल जाते हैं, तब आत्ममंथन करना आवश्यक हो जाता है।
मेरा स्पष्ट मत है कि आधुनिकता अपनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक मर्यादा और पारिवारिक संस्कारों को भुला देना उचित नहीं है।
1. आस्था और मनोरंजन के बीच अंतर समझना होगा
मनोरंजन जीवन का आवश्यक हिस्सा है। संगीत, नृत्य, उत्सव और सामूहिक आनंद भारतीय संस्कृति में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हमारी परंपराओं में लोकगीत, भजन, कीर्तन, रासलीला, रामलीला, फाग, चौताल और अनेक पारंपरिक कलाएँ सदियों से समाज को जोड़ती रही हैं।
समस्या मनोरंजन से नहीं, बल्कि उस समय उत्पन्न होती है जब मनोरंजन धार्मिक आयोजन के मूल उद्देश्य पर हावी हो जाता है।
यदि किसी धार्मिक पंडाल में भक्ति के स्थान पर अभद्र गीत बजाए जाएँ, नशे में लोग मर्यादाहीन व्यवहार करें या पूजा के वातावरण में दूसरों की श्रद्धा और सुविधा की अनदेखी हो, तो हमें विचार करना चाहिए कि हम अपने आयोजन की मूल भावना से कितनी दूर जा रहे हैं।
धार्मिक आयोजन का उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना या तेज आवाज में संगीत बजाना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य श्रद्धा, सामाजिक एकता, सांस्कृतिक शिक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होना चाहिए।
धर्म हमें आनंद मनाने से नहीं रोकता; धर्म हमें आनंद के साथ मर्यादा बनाए रखना सिखाता है।
2. देवी-देवताओं के सामने हमारी जिम्मेदारी क्या है?
जब हम किसी मंदिर में जाते हैं, पूजा करते हैं या किसी धार्मिक उत्सव में भाग लेते हैं, तो हम अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। ऐसे अवसरों पर हमारा व्यवहार भी हमारी आस्था के अनुरूप होना चाहिए।
यदि हम माँ दुर्गा की आराधना कर रहे हैं, तो उस आयोजन में महिलाओं का सम्मान, अनुशासन और सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि हम भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मना रहे हैं, तो प्रेम, करुणा, भक्ति और धर्म के संदेश को भी महत्व देना चाहिए। यदि हम गणेशोत्सव आयोजित करते हैं, तो सामूहिक सहयोग, स्वच्छता और सामाजिक सद्भाव भी हमारे उत्सव का हिस्सा होना चाहिए।
आस्था केवल माथे पर तिलक लगाने या हाथ जोड़ने तक सीमित नहीं है। आस्था हमारे आचरण, व्यवहार और दूसरों के प्रति सम्मान में भी दिखाई देनी चाहिए।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए:
- क्या हमारा आयोजन धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है?
- क्या हमारी गतिविधियों से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सम्मानजनक वातावरण मिलता है?
- क्या संगीत और मनोरंजन की मर्यादा बनी रहती है?
- क्या हम सार्वजनिक स्थानों, ध्वनि-सीमाओं और प्रशासनिक नियमों का पालन करते हैं?
- क्या हमारे आयोजन से समाज में सद्भाव, सेवा और संस्कारों का संदेश जाता है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है, तो हमारा उत्सव वास्तव में सार्थक है।
3. विवाह संस्कार: दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण है पवित्र संबंध
भारतीय परंपरा में विवाह केवल उत्सव या सामाजिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों, दो परिवारों और उनकी जिम्मेदारियों के जुड़ने का महत्वपूर्ण संस्कार है।
विवाह में संगीत, नृत्य, हँसी-खुशी और उत्सव का अपना महत्व है। परिवार और मित्र मिलकर आनंद मनाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन जब पूरा आयोजन केवल दिखावे, अनावश्यक खर्च, नशे या अशोभनीय व्यवहार की प्रतिस्पर्धा बन जाता है, तब उसके मूल उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दूल्हे का स्वागत सम्मानपूर्वक हो, वधू का आदर हो, दोनों परिवारों के बीच प्रेम और सहयोग हो तथा विवाह में शामिल प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित और सहज महसूस करे—यही किसी सुंदर आयोजन की पहचान होनी चाहिए।
संगीत का चयन भी अवसर और पारिवारिक वातावरण के अनुरूप किया जा सकता है। पारंपरिक विवाह गीत, मंगलगीत, शहनाई, ढोलक, लोकसंगीत और मर्यादित आधुनिक संगीत—इन सभी के लिए स्थान हो सकता है।
हमें यह समझना चाहिए कि किसी गीत का आधुनिक होना अपने आप में गलत नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या उसका चयन अवसर, परिवार की सहमति और सामाजिक मर्यादा के अनुरूप है।
विवाह की प्रतिष्ठा महँगे मंच, तेज आवाज या दिखावे से नहीं, बल्कि संस्कार, सम्मान, स्नेह और जिम्मेदारी से बढ़ती है।
4. क्या हमारी पारंपरिक कलाएँ पीछे छूट रही हैं?
भारत की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी लोकधुनें, पारंपरिक वाद्ययंत्र, धार्मिक गीत, नृत्य और उत्सवों की विशिष्ट परंपराएँ हैं।
उत्तर भारत में भजन-कीर्तन, रामलीला, फाग और मंगलगीतों की परंपरा है। अनेक क्षेत्